खेतों में खिली वसंत की सरसों का एक फूल मालती ने तोड़ा होगा, अपनी सहेली प्रकृति से प्रेम का गीत सीखा होगा। शायद इसलिए आज इन खेत खलिहानों में नमी सी है। मालती के खून से भीगी मेड़ का कलेजा फटा जाता है। उसे पता है कि वो हंसती खिलखिलाती गुड़िया कभी उस पर से नहीं गुजरेगी। सांस टूटने से पहले मालती के आखिरी शब्द थे, अरी मैया। शोक मग्न खेतों से बाहर आकर देखा तो गांव की संवेदनाओं को मरा हुआ पाया। यहां सब कुछ सामान्य है। गांव की एक बिटिया बेमौत मारी गई और किसी के चेहरे पर शिकन तक नहीं। घर के आंगन में बैठी मां की आंखों में दो आंसू भी नहीं। दुनिया से जाते-जाते मालती ने सोचा भी न होगा कि बरसों तक उसे पालने पोसने वाली मैया भी पत्थर दिल हो जाएगी।
आगरा। लखनामई की मालती किसी की संवेदनाओं के दायरे में नहीं आती। लड़की जो थी। बेटियाें की आजादी, लड़का-लड़की एक समान, बेटी बचाओ और नारी सशक्तीकरण का ढोल पीटने वाले समाज का यह स्याह चेहरा है। विद्रूप देखिए, मालती और उसके जैसी अनेक लड़कियाें के लिए न्याय की आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। मानवाधिकार संगठन, महिला संगठन, राजनीतिक प्रतिनिधि, एनजीओ... गांव में दूर-दूर तक नजर नहीं आए। पुलिस प्रशासन ने तो ऑनर किलिंग पर पर्दा डालकर मालती के घरवालों की गढ़ी कहानी को ही सच मान लिया।
खेत से निकलकर मालती के घर को चले तो बीच में उसकी चचेरी बहन हेमलता को खाट पर पाया। वही हेमलता जो सोमवार की शाम खेत में मालती के साथ थी। उस घटना की एकमात्र चश्मदीद 14 साल की इस लड़की के चेहरे पर खौफ है और आंखों में बेबसी। पूछने पर कुछ नहीं बोलती। बहुत मनुहार पर कुछ बताना शुरू किया, पर मां का इशारा मिलने पर फिर से होंठ दबा लिए। उसके हाव भाव कह रहे थे कि जो वह कह रही है, सच नहीं है। ‘‘वो फोन पर बात करती जा रही थीं। खेत में जाकर मुझे अलग कर दिया और सोनू से बात करने लगीं। उसके बाद मैंने गोलियों की आवाज सुनी। सोनू के साथ आया लड़का भाग गया। मालती दीदी ने बस इतना ही कहा अरी मैया।’’
इससे थोड़ी दूर मालती का घर है। करुण क्रंदन का कोई स्वर नहीं सुनाई देता। अंदर घर की औरतें घूंघट कांढ़े बैठी हैं। मां बबली भी वही कहानी दोहराती हैं। हमें कछू नाय पतौ ही। बानै कबहू नाय कही कि ब्याह नाय करनौ। अच्छी भली हती। अपए लै साड़ी खरीदकै लाई। बताते हुए भी उनका गला नहीं रुंधता। शायद सीने पर पत्थर रख लिया है। गांव वाले भी मुंह नहीं खोलते।
बेटा, अब तेरी मैया कैसे जीवैगी
लखनामई से बिल्कुल उलट है संवाई की तस्वीर। घर के बाहर गांव के लोग बैठे हैं। अंदर कोहराम मचा है। मां कमलेश का विलाप हृदय विदारक है। उन्हें ढांढस बंधातीं गांव की औरतों की रुलाई फूट पड़ती है। बेटा अब तेरी मैया कैसे जीवैगी... रुंधे कंठ से मां कहती है। छह भाई बहनों में सबसे बड़ा सोनू उनका बहुत लाड़ला था। घर का सहारा भी। छोटी बहन कल्पना एक कोने में बैठी फफक रही है। सब समझाते हैं पर उसके आंसू नहीं रुकते। भैया की खूबी पूछने पर बोली, हम सबकू बहुत प्यार ते रखते। कबहू कछू नाय कहते। बिनकेजैसौ परिवार मै कोऊ नाय।
दादी सुखदेवी की पीड़ा कौन कहे। बोलीं, मैं कहती रह गई बेटा चाय पी जा। बोलौ, बाद मै आयकै पीऊंगौ। का पतौ ही कि अब कबहू नाय आवैगौ। पुलिस के रवैये ने इस परिवार को और भी तोड़ दिया है। पिता अशोक अपने बेटे को न्याय दिलाना चाहते हैं पर पुलिस प्रशासन उन्हीं से सुबूत मांग रहा है।
जहां जातीं, मुस्कान छोड़ आती
गेेहुंआ रंग, हंसमुख स्वभाव... जिस देहरी पर जाती, होंठों पर मुस्कान छोड़ आती। घर से मालती का यही परिचय मिला। फोटो मांगा तो सब आनाकानी करने लगे, हमाये जौहरे एक ऊ फोटो नाय। बहुत देर बाद चाचा के घर से उसकी एक तस्वीर मिली। पिता ने पांचवीं तक पढ़ाकर मालती को घर बिठा लिया पर उसने कभी शिकायत न की। उसका प्यार का नाम मल्ला था। चाची ताई बताती हैं कि मालती बहुत खुशदिल और कमेरी थी। कुएं से लाया उसका पानी अब तक रखा है। बहुत कुरेदने के बाद भी बस इतनी ही मिल पाई मालती। छिपावट के बीच कुछ खुला था तो शादी में दिए जाने वाला सामान। मालती की लाई साड़ियां और सिंगार की चीजें। मालती को लेकर घर की सभी औरतों की एक ही कहानी है। ऐसी पतौ होती तौ ब्याह च्यौं करते। शादी के कार्ड ऊ बंट गए। मां बबली का चेहरा भाव शून्य है। अंतर्मन का कुछ भी पढ़ना मुश्किल है। पिता और भाई का पूछने पर जवाब मिला, किसी काम से बाहर निकल गए हैं। घर के बाहर चार आदमी भी बैठे नहीं मिले।