आजादी के 63 साल बाद शहर को डा. रामशंकर कठेरिया के रूप में तीसरी बार केंद्रीय मंत्री मिला। मगर, शहर को इसका लाभ नहीं मिल पाया। उनके 19 महीने के कार्यकाल में शहर को विकास की पटरी पर लाने वाली केंद्र सरकार की एक भी योजना धरातल पर साकार नहीं हो सकी। यहां तक कि डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय की कार्य प्रणाली तक ढर्रे पर नहीं आ पाई। छात्रों के भविष्य के साथ यहां खिलवाड़ बदस्तूर जारी है।
कठेरिया से पहले फीरोजाबाद संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे रामजी लाल सुमन केंद्र सरकार में मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रह चुके हैं। उन्हें चंद्रशेखर सरकार में श्रम मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तब परिसीमन से पहले आगरा की तीन विधानसभाएं (बाह, फतेहाबाद, खेरागढ़) फीरोजाबाद संसदीय क्षेत्र में थीं। उनसे पहले आगरा से सांसद रहे जनता दल की सरकार में अजय सिंह रेल उपमंत्री रह चुके हैं। बता दें कि स्वतंत्र भारत में वर्ष 1951 पहली बार हुए चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचने वाले सेठ अचल सिंह को चार बार सांसद चुने जाने के बाद भी कांग्रेस ने सरकार में जगह नहीं दी थी। कठेरिया शहर के तीसरे और भाजपा के पहले ऐसे नेता हैं, जिन्हें केंद्र में मंत्री पद से नवाजा गया। ऐसे में शहर को उनसे काफी उम्मीदें थीं।
इन योजनाओं को लेकर थीं उम्मीदें
शहरवासियों को कठेरिया से शहर में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, हाईकोर्ट की खंडपीठ, महताब बाग से ताजमहल का नाइट व्यू, पासपोर्ट ऑफिस, यमुना सफाई और बैराज का निर्माण, सोलर सिटी स्थापित कराने की उम्मीदें थीं। क्योंकि ये केंद्र सरकार से जुड़े हुए मुद्दे थे। मगर, इनमें से एक भी कार्य की शुरुआत नहीं हो सकी। सिर्फ हवाई बातें होती रहीं। इसके अलावा शहर को उनके कार्यकाल में शहर को एक भी उपलब्धि हासिल नहीं हो सकी। यहां तक कि अपने मंत्रालय से ताल्लुक रखने वाले विश्वविद्यालय तक के हालात नहीं सुधार सके।
छह महीने में मिले थे तीन प्रमोशन
सांसद डा. रामशंकर कठेरिया को छह महीने के भीतर ही पार्टी आलाकमान ने लगातार तीन प्रमोशन दिए थे। मई 2014 में सवा तीन लाख वोटों से चुनाव जीते थे। 16 अगस्त को पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव घोषित कर दिया। राष्ट्रीय महासचिव बने दो महीने पूरे ही हुए थे कि उन्हें पंजाब और छत्तीसगढ़ राज्य का प्रभारी बना दिया। इन दोनों राज्यों की राजनीतिक स्थिति वह ठीक से समझ भी नहीं पाए थे कि एक महीने के भीतर ही उन्हें मोदी सरकार में जगह मिल गई थी।
संघ से मिला आशीर्वाद
डा. कठेरिया ने 1986 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक की सदस्यता ग्रहण की थी। वर्ष 2005 में भाजपा के जिला महामंत्री के रूप में राजनीति की मुख्य धारा में आए। इसी आशीर्वाद की वजह से उन्हें 2009 के लोकसभा चुनाव में पहली बार टिकट मिली।