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चंबल में बढ़ा कछुओं का कुनबा

Mon, 15 Jun 2015 02:34 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला
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दुर्लभ घड़ियालों के संरक्षण के लिए मशहूर चंबल सेंक्च्युरी के रेड जोन में आई कछुओं की सात प्रजातियां तेजी से आबाद हो रही हैं। धोंड, धमौका, साल, पचेडा, कटहेवा, सुंदरी, इंडियन स्टार प्रजातियों के 236 नेस्टों में हैचिंग के दौरान 6645 शिशुओं ने जन्म लिया है। जबकि 140 अंडे नष्ट हो गए। वन विभाग इन नन्हें मेहमानों के आने से बेहद खुश है।
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कछुओं की सात प्रजातियां रेड जोन में आने के बाद चंबल सेंक्च्युरी में इनका संरक्षण हो रहा है। हालांकि शुरूआती सालों में कोई खास कामयाबी नहीं मिली लेकिन अब तेजी से इनकी आबादी बढ़ रही है। वन विभाग घड़ियालों की तर्ज पर कछुओं की भी हैचिंग और नेस्टिंग प्रक्रिया अपना रहा है। जीपीएस सिस्टम से नेस्टों की निगरानी की जा रही है। नेस्टिंग से हैचिंग तक 60 से 120 दिन का पीरियड होता है। मादा एक नेस्ट में एक से 30 तक अंडे देती है। इसके बाद बालू से उनको ढक देती है। अंडों को वन्यजीवों से बचाने के लिए जाली लगा दी जाती है। हैचिंग पीरियड के दौरान सरसराहट की आवाज आने पर जाली हटा दी जाती है। चंबल के विभिन्न घाटों पर 236 नेस्टो में 6785 अंडे सुरक्षित रखे गए थे। बीते तीन दिन में हैचिंग के दौरान 6645 नन्हें कछुओं ने जन्म लिया है। जबकि 140 अंडे नष्ट हो गए। नेस्टों से बाहर आते ही शिशु बालू पर सरकते हुए नदी में पहुंच गए।
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संकट में पड़ी कछुओं की सात प्रजातियों को रेड जोन में रखा गया है। चंबल नदी में इनका संरक्षण हों रहा है। हैचिंग में 6645 शिशुओं का जन्म हुआ है। 140 अंडे नष्ट हो गए। फिलहाल घड़ियाल के शिशुओं के साथ कछुओं के शिशुओं की भी देखभाल की जा रही है।
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                    - आरके शर्मा, रेंजर वन्यजीव, बाह
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इसलिए रेड जोन में रखी गई प्रजातियां
शिकार और दवाओं के चक्कर में की गई तस्करी के चलते कछुओं की आबादी तेजी से घटी थी। बिहार बंगाल में कछुआ के मांस की सर्वाधिक मांग रहती है। इसके अलावा सेक्स वर्धक दवाओं के निर्माण में भी कछुआ के अंगों का इस्तेमाल होता है। इन्हीं कारणों के चलते चंबल में आबाद हो रही सात प्रजातियां रेड जोन में रखी गई हैं।
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सुंदरी कछुआ की कीमत लाखों में
सुंदरी कछुआ की कीमत लाखों में होती है। कारण इसके चारों पंजों में 20 नाखून होते हैं। तंत्र मंत्र में इस प्रजाति के कछुओं का अंधविश्वासी लोग रातों रात करोड़पति बनने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
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युद्ध के लिए बनती थी ढाल
प्राचीन काल में जब युद्ध तलवारों से लड़ा जाता था। तब कछुआ की खाल का इस्तेमाल ढाल के रूप में किया जाता था। कटोरानुमा इस आकृति का कठोरता के चलते सैनिक ढाल के रूप में प्रयोग करते थे।
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