तुलनात्मक रवैया आत्महत्या की वजह
सरस्वती विद्या मंदिर, कमलानगर में अभिभावकों के लिए आयोजित कार्यशाला में कोलकाता से आईं डॉ. सुभोनी चक्रवर्ती ने कहा कि बच्चों की दूसरों की तुलना करना गलत है। कोलकाता में इस वर्ष 30 फीसदी मामलों में 10 से 15 वर्ष तक के बच्चों ने तुलनात्मक रवैये की वजह से आत्महत्या कर ली।
डॉ. सुचित तंबोली ने कहा कि बच्चे की मनोदशा ठीक न हो, कामकाज व पढ़ाई में रुचि न ले रहा हो, पूरी नींद न ले रहा हो, वजन गिर रहा तो, समझना चाहिए कि बच्चा तनाव में है। तुरंत डाक्टरों की सलाह लेनी चाहिए।
केमिकल लोचा बच्चों को चंचल बना रहा: डॉ. सुनील
परिचर्चा में पुणे के डॉ. सुनील गोडबोले ने कहा कि दिमाग के कई तरह के केमिकल होते हैं। जिनके असंतुलन से बच्चे चंचल (हाइपर एक्टिव) हो जाते हैं। केमिकल लोचा बच्चों को चंचल बना रहा है। इसे ऑटिज्म कहते हैं। आटिज्म के बारे में शुरूआत में पता चल जाए तो बिहेवियर थेरेपी से बच्चों का इलाज किया जा सकता है। आटिज्म आने वाले साइलेंट पेंडेमिक है।
ये दुष्परिणाम सामने आ रहे
बच्चों में स्क्रीन की लत लग रही है। छोटे बच्चों में भी मोबाइल इस्तेमाल की लत लग गई है। किशोर और किशोरियों में पोर्नोग्राफी की तरफ रुझान बढ़ा है। चंचल बच्चे अटेंशन डिफेक्ट हाइपर एक्टिविटी डिसॉर्डर (एडीएचडी) का शिकार हो रहे हैं।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निदेशक चिकित्सा शिक्षा डॉ. एनसी प्रजापति ने कहा कि प्रदेश के हर मेडिकल कॉलेज में रिसर्च यूनिट होगी। कानपुर और नोएडा में यह शुरू भी किए जा चुके हैं। इससे सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों को शोध करने में मदद मिलेगी।