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आगरा: कोरोना काल में बच्चों में बढ़े स्कूल फोबिया के मामले, मोबाइल देखने की भी लगी बुरी लत

Sun, 19 Dec 2021 09:44 AM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, आगरा

सार

कोरोना काल में बच्चों के व्यवहार में आए बदलाव पर चर्चा के लिए एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी) व ग्रोथ डेवलपमेंट एंड बिहेवियोरल पीडिएट्रिक्स (जीडीबीपी) के बैनर तले शनिवार को आगरा के होटल क्रिस्टल सरोवर में जीडीबीपीकॉन-2021 का आगाज हुआ। 
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जीडीबीपीकॉन-2021 में विशेषज्ञ चिकित्सक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आगरा के जीडीबीपीकॉन के तहत कोरोना महामारी की वजह से बच्चों में पैदा हुई समस्याओं के निराकरण के लिए सरस्वती विद्या मंदिर, सेंट पैट्रिक्स स्कूल व विम्स हॉस्टिल में अभिभावक, शिक्षक व नर्सों के लिए कार्यशाला का आयोजन किया गया। 

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बच्चों में स्कूल फोबिया के मामले बढ़े हैं
डॉ. संजीव अग्रवाल ने कहा कि कोरोना काल में बच्चों में तनाव, अकेलेपन, हकलाना, असामान्य व्यवहार जैसे मामले बढ़े हैं। बच्चों का मस्तिष्क अपेक्षाकृत कम परिपक्व होता है। इसलिए कोरोना काल का उन पर अधिक प्रभाव पड़ा है। 

ऐसे मामले बाल रोग विशेषज्ञों के पास पहुंच रहे हैं, जिसमें बच्चा, अब स्कूल जाने को तैयार नहीं। डॉ. राजीव कृषक और डॉ. अश्विनी गोवली ने कहा कि कोरोना काल में बच्चों में तनाव 70 से 80 फीसदी तक बढ़ा है। करीब 60 फीसदी बच्चों ने अभिभावकों के साथ समय बिताने की मांग की। 

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तुलनात्मक रवैया आत्महत्या की वजह 
सरस्वती विद्या मंदिर, कमलानगर में अभिभावकों के लिए आयोजित कार्यशाला में कोलकाता से आईं डॉ. सुभोनी चक्रवर्ती ने कहा कि बच्चों की दूसरों की तुलना करना गलत है। कोलकाता में इस वर्ष 30 फीसदी मामलों में 10 से 15 वर्ष तक के बच्चों ने तुलनात्मक रवैये की वजह से आत्महत्या कर ली। 

डॉ. सुचित तंबोली ने कहा कि बच्चे की मनोदशा ठीक न हो, कामकाज व पढ़ाई में रुचि न ले रहा हो, पूरी नींद न ले रहा हो, वजन गिर रहा तो, समझना चाहिए कि बच्चा तनाव में है। तुरंत डाक्टरों की सलाह लेनी चाहिए। 

केमिकल लोचा बच्चों को चंचल बना रहा: डॉ. सुनील 
परिचर्चा में पुणे के डॉ. सुनील गोडबोले ने कहा कि दिमाग के कई तरह के केमिकल होते हैं। जिनके असंतुलन से बच्चे चंचल (हाइपर एक्टिव) हो जाते हैं। केमिकल लोचा बच्चों को चंचल बना रहा है। इसे ऑटिज्म कहते हैं। आटिज्म के बारे में शुरूआत में पता चल जाए तो बिहेवियर थेरेपी से बच्चों का इलाज किया जा सकता है। आटिज्म आने वाले साइलेंट पेंडेमिक है। 
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ये दुष्परिणाम सामने आ रहे 
बच्चों में स्क्रीन की लत लग रही है। छोटे बच्चों में भी मोबाइल इस्तेमाल की लत लग गई है। किशोर और किशोरियों में पोर्नोग्राफी की तरफ रुझान बढ़ा है। चंचल बच्चे अटेंशन डिफेक्ट हाइपर एक्टिविटी डिसॉर्डर (एडीएचडी) का शिकार हो रहे हैं। 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निदेशक चिकित्सा शिक्षा डॉ. एनसी प्रजापति ने कहा कि प्रदेश के हर मेडिकल कॉलेज में रिसर्च यूनिट होगी। कानपुर और नोएडा में यह शुरू भी किए जा चुके हैं। इससे सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों को शोध करने में मदद मिलेगी।
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