पिता ने बताया कि शुभम 2015 में नेशनल डिफेंस एकेडमी में गए थे। 27 साल के शुभम जांबाज कमांडो होने के साथ परिवार के लाडले थे। ताऊ, चाचा, भाई व दोस्तों को उन पर गर्व होता था। स्कूल में होनहार रहे शुभम को पियानो बजाने और गायकी का बेहद शौक था। सेना की 9 पैरा कमांडो का मुख्यालय बंगलूरू में स्थित है। 1966 में इसे स्थापित किया गया था। यहां सेना के स्पेशल फोर्स के जवानों को तैयार किया जाता है, जो कठिन परिस्थितियों में निडर होकर देश की सेवा करते हैं।
ऐ मेरी जमीं, महबूब मेरी, मेरी नस नस में तेरा इश्क बहे
ऐ मेरी जमीं, महबूब मेरी, मेरी नस नस में तेरा इश्क बहे...। फिल्म केसरी के इस गीत को 2020 में कैप्टन शुभम गुप्ता ने जब मंच से गाया था तो दोस्त उनकी आवाज के मुरीद हो गए थे। इस गीत ने शुभम की जिंदगी बदल दी। शुभम को गीत-संगीत का बेहद शौक था। वह अपनी आवाज में कई गाने रिकॉर्ड किए। सोशल मीडिया पर बृहस्पतिवार को उनकी आवाज में गाए गीत प्रसारित होते रहे। जब छुट्टियों में आते तो अपने एक दोस्त के साथ संगीत में हाथ आजमाते थे।
नहीं जले चूल्हे, हर आंख नम
कैप्टन शुभम गुप्ता का पैतृक गांव कुआंखेड़ा है। शहादत के बाद से यहां चूल्हे नहीं जले। गांव में हर आंख नम है। हर दिल गमगीन है। हर कोई शुभम के पार्थिव शरीर के दर्शन के लिए व्याकुल है। इस शहादत ने कुआंखेड़ा गांव में 23 साल पहले हुई असम राइफल्स के जवान राधेश्याम यादव के बलिदान की यादों को ताजा कर दिया। कुआंखेड़ा का यह दूसरा लाल है जो आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुआ। 2000 में मणिपुर में राधेश्याम आतंकियों के आईईडी ब्लास्ट में शहीद हुए थे। तब शुभम की उम्र पांच साल थी। यूं तो कुआंखेड़ा गांव में हर घर से एक बेटा फौज में जाकर देश सेवा के लिए जाता है। शहीद राधेश्याम के बेटे अवधेश यादव का कहना है कि बलिदान गर्व का मौका देता है लेकिन उम्रभर का गम भी रहता है।