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Rajouri Encounter: देश सेवा के लिए शुभम ने चुनी थी स्पेशल फोर्स, बने कमांडो; ट्रेनिंग के बाद परिवार को चला पता

Fri, 24 Nov 2023 11:33 AM IST
विजय पुंडीर अमर उजाला नेटवर्क, आगरा

सार

कैप्टन शुभम गुप्ता का पैतृक गांव आगरा का कुआंखेड़ा है। शहादत के बाद से यहां चूल्हे नहीं जले। गांव में हर आंख नम है। हर दिल गमगीन है। हर कोई शुभम के पार्थिव शरीर के दर्शन के लिए व्याकुल है।
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कैप्टन शुभम गुप्ता आतंकी मुठभेड़ में शहीद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देश सेवा का जज्बा और जुनून ही शहीद कैप्टन शुभम को आतंकियों से लोहा लेने के लिए जम्मू कश्मीर ले गया। नेशनल डिफेंस एकेडमी से निकलने के बाद 2018 में सेना की सिग्नल कोर में शुभम भर्ती हुए। यहां रहते हुए उन्होंने कमांडो बनने का सपना देखा। कड़ी परीक्षा के बाद 9 पैरा स्पेशल फोर्स में शामिल हो गए और सपने को पूरा किया।

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जुलाई के पहले सप्ताह में शुभम आगरा आए थे। तब वह बेलगाम से 40 दिन की पैरा कमांडो स्पेशल ट्रेनिंग लेकर लौटे थे। 25 नवंबर को शुभम को आना था, लेकिन नहीं आ सके थे। फोन पर परिजन से कहा था कि इस बार 8 से 10 दिन की छुट्टी लेकर आऊंगा। दिसंबर के पहले सप्ताह में छोटे भाई ऋषभ का जन्मदिन था। शुभम ने बड़ी पार्टी करने का वादा किया था।

पिता बसंत गुप्ता ने बताया कि सिग्नल कोर से शुभम स्पेशल फोर्स में अपनी मर्जी से चला गया था। बताया तक नहीं। एक दिन जब उसका कैप्टन दोस्त आया तो उसने बताया कि शुभम ने स्पेशल फोर्स जॉइन कर लिया है। फ्रंट पर लड़ेगा। मुझे बेटे पर बहुत गर्व है।

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पिता ने बताया कि शुभम 2015 में नेशनल डिफेंस एकेडमी में गए थे। 27 साल के शुभम जांबाज कमांडो होने के साथ परिवार के लाडले थे। ताऊ, चाचा, भाई व दोस्तों को उन पर गर्व होता था। स्कूल में होनहार रहे शुभम को पियानो बजाने और गायकी का बेहद शौक था। सेना की 9 पैरा कमांडो का मुख्यालय बंगलूरू में स्थित है। 1966 में इसे स्थापित किया गया था। यहां सेना के स्पेशल फोर्स के जवानों को तैयार किया जाता है, जो कठिन परिस्थितियों में निडर होकर देश की सेवा करते हैं।

ऐ मेरी जमीं, महबूब मेरी, मेरी नस नस में तेरा इश्क बहे
ऐ मेरी जमीं, महबूब मेरी, मेरी नस नस में तेरा इश्क बहे...। फिल्म केसरी के इस गीत को 2020 में कैप्टन शुभम गुप्ता ने जब मंच से गाया था तो दोस्त उनकी आवाज के मुरीद हो गए थे। इस गीत ने शुभम की जिंदगी बदल दी। शुभम को गीत-संगीत का बेहद शौक था। वह अपनी आवाज में कई गाने रिकॉर्ड किए। सोशल मीडिया पर बृहस्पतिवार को उनकी आवाज में गाए गीत प्रसारित होते रहे। जब छुट्टियों में आते तो अपने एक दोस्त के साथ संगीत में हाथ आजमाते थे।

नहीं जले चूल्हे, हर आंख नम
कैप्टन शुभम गुप्ता का पैतृक गांव कुआंखेड़ा है। शहादत के बाद से यहां चूल्हे नहीं जले। गांव में हर आंख नम है। हर दिल गमगीन है। हर कोई शुभम के पार्थिव शरीर के दर्शन के लिए व्याकुल है। इस शहादत ने कुआंखेड़ा गांव में 23 साल पहले हुई असम राइफल्स के जवान राधेश्याम यादव के बलिदान की यादों को ताजा कर दिया। कुआंखेड़ा का यह दूसरा लाल है जो आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुआ। 2000 में मणिपुर में राधेश्याम आतंकियों के आईईडी ब्लास्ट में शहीद हुए थे। तब शुभम की उम्र पांच साल थी। यूं तो कुआंखेड़ा गांव में हर घर से एक बेटा फौज में जाकर देश सेवा के लिए जाता है। शहीद राधेश्याम के बेटे अवधेश यादव का कहना है कि बलिदान गर्व का मौका देता है लेकिन उम्रभर का गम भी रहता है।
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