शिक्षा माफिया ने डा. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय को मार्क्सशीट बेचने की मंडी बना दिया था। पांच सालों तक बीएड के जाली अंकपत्र छुपाकर नहीं, खुल्लम-खुल्ला सजाकर बेचे गए। रेट लिस्ट देखिए, पैसा दीजिए और मनचाही अंक ले जाइए। न दाखिले की जरूरत थी, न पढ़ाई की और न ही परीक्षा देने की।
जाली मार्क्सशीट दिलाने से लेकर इसे विवि के रिकार्ड में दर्ज कराने का ठेका ले रहे थे कालेज संचालक। इनके पैसे की डोर पर विवि का पूरा सिस्टम कठपुतली की तरह नाच रहा था। एसआईटी की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि स्नातक करने वाले छात्रों के पास घर बैठे बिठाए बीएड करने के आफर को लेकर कालेजों से दलाल भेजे जाते थे।
केस से जुड़े सूत्रों ने बताया कि बीएड प्रवेश परीक्षा में फेल हो जाने वाले छात्रों पर इनका फोकस रहता था।
एसआईटी की जांच बताती है कि 2004-05 और 2005-06 के सत्र में यह जालसाजी बहुत ज्यादा नहीं हो पाई थी। लेकिन इन दो सालों में जालसाजी से बीएड करने वाले छात्रों की लिस्ट शिक्षा माफिया के काम आई।
इसे दिखाकर नए शिकार जाल में फंसाए गए। 2007 से 2009 के बीच ये माफिया खुलकर बोली लगाने लगे। पहले जालसाजी लगभग 40 कालेज कर रहे थे, बाद में इनकी संख्या 83 तक पहुंच गई। विवि का पूरा सिस्टम इन्होंने खरीद लिया था। एसआईटी की 2,000 पन्नों की जांच रिपोर्ट में इस पूरे खेल का भी जिक्र है। इसे उच्च न्यायालय के सामने रखा जा चुका है। सुनवाई की अगली तारीख 27 अक्तूबर है।
गोरखधंधा
- सबसे ज्यादा ऐसे छात्र रहे जिन्होंने बगैर दाखिला लिए कॉलेजों से बीएड की मार्क्सशीट खरीदी।
- 70 फीसदी छात्र कॉलेजों के माध्यम से आए, बाकी ने सीधे विवि के दलालों से संपर्क किया।
- जेनरेटेड मार्क्सशीट का रिकार्ड गोपनीय चार्ट में दर्ज कराने का भरोसा दिया जाता था छात्रों को ।
- कुछ छात्र ऐसे भी रहे जिन्होंने परीक्षा तो दी, लेकिन दलालों के माध्यम से नंबर बढ़वाए।
टू ‘डब्लू’ दो, ‘जीएम’ ले जाओ
2007 से 2009 में बीएड करने वाले छात्रों से एसआईटी ने बात की तो पता चला कि जाली मार्क्सशीट बेचने वालों में कुछ ऐसे भी रहे जिन्होंने सिर्फ पैसा नहीं कमाया, बल्कि अय्याशी भी की। ये लोग दलालों से काल गर्ल और शराब की डिमांड भी करते थे। इस जालसाजी से नाराज छात्र कोड वर्ड में कहते थे यहां तो दलाल को टू डब्लू (वूमैन और वाइन) दो और जीएम ( जेनरेटेड मार्क्सशीट) ले जाओ।
स्पेशल पैकेज भी
आठवीं-दसवीं फेल छात्रों को बीएड तक की सभी मार्क्सशीट पैकेज में दी गईं। इनसे चार लाख तक लिए गए। हालांकि ऐसे छात्रों की संख्या बहुत कम रही। दलालों ने इनके बीएड का रिकार्ड विवि के गोपनीय चार्ट में दर्ज करा दिया, लेकिन स्नातक, इंटर और हाईस्कूल का रिकार्ड कहीं दर्ज नहीं करा पाए।
करोड़ों का नहीं, अरबों का घोटाला
एसआईटी पहले समझ रही थी कि यह घोटाला करोड़ों रुपये का है। लेकिन जब हिसाब किताब किया तो पता चला कि घोटालेबाजों ने अरबों के वारे-न्यारे किए हैं। जाली मार्क्सशीट सैकड़ों में नहीं, हजारों में जारी की गई। कुल 25 हजार जाली मार्क्सशीट जारी करने का अनुमान है।
घोटालेबाज लिपिकों ने खोल लिए कॉलेज
एसआईटी को जानकारी मिली है कि घोटाले में शामिल रहे कई लिपिकों ने जाली मार्क्सशीटों से दौलत बटोरकर निजी कॉलेज खोल लिए हैं। राजस्थान में ऐसे कई कालेजों की जानकारी मिली है। एसआईटी इस दिशा में जांच कर रही है। हालांकि इसके पुख्ता साक्ष्य अभी तक हाथ नहीं आए हैं।