हास्य कवि वाहे गुरु भाटिया ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में लोग इतने भोले होतें हैं कि उन्हें यह भी नहीं पता होता कि कौन सी चीज़ खानी है। मन के साफ होते हैं। वैसे ही पेंटर भी होते हैं। उनके प्रिंट करने वाले भी वैसे ही होते हैं। रूमाल पर लिख देते हैं आई लव यू, बहन अपने भाई को जो राखी बांधती है, उस पर भी कुछ न कुछ लिखा होता है। ऐसा ही मैंने गांव में देखा है, कि लिख देते हैं हम आपके हैं कौन, राधा–कृष्ण, लेकिन वो अपनी भावनाएं हैं। एक बहन अपने भाई को जो शरहद पर है उसको राखी भेजती है। राखी पर लिखा रहता है हम आपके हैं कौन। तो वहां से मैंने पंक्तियां उठाईं...
आगे उन्होंने कहा कि मैं तो उस पल को देखता हूं....
न जाने मेरे देश में ऐसी मोहब्बत कब आएगी,
जब चारों कोम के भाईयों को बैठाकर, एक बहन से राखी बंधवाएगी ।
भाई अपनी बहन से राखी ही न बंधवाए
उन्होंने कहा कि हम इसी पल के लिए तरस रहे हैं। हिंदू अलग हो गया मुसलमान अलग हो गया, राखी का मतलब ही समझना लोगों ने बंद कर दिया। अब तो मेरे ख्याल से भाई अपनी बहन से राखी ही न बंधवाए, पति को बांधे, जब वो रक्षा ही नहीं कर पा रहा है। पति से ही रक्षा नहीं कर पा रहा है। हमने अपनी बहन को विदा कर दिया उसके बाद बहन टूट रही है, पिट रही है, उसके साथ क्या हो रहा है हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता, तो फिर इस रिश्ते का मतलब क्या। फिर तो जैसे रानी अपने राजा को तिलक लगाकर, रक्षासूत्र बांधती है, वैसे ही राखी भी तो रक्षासूत्र ही है।
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