ब्रज की होली के रंग सबसे निराले हैं। अतीत के पन्ने पलटें तो यह रंग और भी चटख मिलते हैं। तब होली एक-दो दिन नहीं, महीने भर का त्योहार होती थी और हुड़दंग भी जबरदस्त होता था। वक्त के साथ कई चीजें बदलती चली गई लेकिन उल्लास और उत्साह आज भी बना हुआ है।
ढोलक की थाप, मजीरे की झंकार, हारमोनियम के स्वर, घुंघरूओं की छन-छन और नर्तकियों संग ठुमकते लोग.. कभी ऐसी ही रंगत होती थी भदावर क्षेत्र की राजपूती होली की। आगरा जिले बाह क्षेत्र में राजपूती महफिलों की ठसक ब्रज की होली के रंग को चटख कर देती थी। वक्त की करवट के साथ सिमटी होली की महफिलों के दायरे संग अतीत की रंगीन यादें आज भी जिंदा है।
बाह, धौलपुर, मुरैना, भिंड, मैनपुरी और इटावा तक फैले भदावर क्षेत्र में होली आते ही महफिलें सजने लगती थीं। वसंत पंचमी से फाग तक जमने वाली महफिलों की अब यादें ही बची हैं। गांव की चौपालों इनकी चर्चा के साथ सामाजिक प्रेम और सद्भाव के वो दिन याद कर बुजुर्ग बताते हैं कि आजकल महफिलें जमती ही नहीं। वे कहते हैं कि नई पीढ़ी तो टीवी और मोबाइल से फुर्सत ही कहां तो होली की महफिल सजाएं।