अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित आगरा लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी व केंद्रीय राज्यमंत्री एसपी सिंह बघेल के जाति प्रमाणपत्र पर फिर सवाल खड़े हो गए हैं। डॉ. अंबेडकर समाज सेवा ट्रस्ट अध्यक्ष अनिल सोनी ने बुधवार को मंडलायुक्त रितु माहेश्वरी से शिकायत दर्ज कराई है। प्रमाण पत्र की जांच के लिए जिला स्क्रूटनी कमेटी गठित करने की मांग की गई है।
प्रताप नगर स्थित अलका पुरी निवासी अनिल सोनी का आरोप है कि पिछड़ा वर्ग के व्यक्ति एसपी सिंह बघेल ने राजनीतिक प्रभाव का दुरुपयोग कर आरक्षण का लाभ लेने के लिए गलत तथ्यों से अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र जारी कराया है। वह जन्म से पिछड़ा वर्ग की उपजाति पाल, बघेल गडेरिया है।
राजनीतिक प्रभाव और तहसील के कर्मचारी व अधिकारियों की सांठगांठ से उन्होंने 4 फरवरी 2016 को धनगर लिखवाकर अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र जारी कराया है। जारी प्रमाण पत्र पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के जिस निर्णय का जिक्र है उसे स्वयं आयोग ने ही बाद में रिव्यू कर लिया था।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि एसपी सिंह बघेल ने 4 अगस्त 1975 को 11 वीं कक्षा में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, विजावर, जिला छतरपुर मध्य प्रदेश से शिक्षा ग्रहण की। जिसके छात्र रजिस्टर उनकी जन्मतिथि 21 जून 1960 और जाति के ठाकुर दर्ज है।
10वीं कक्षा की पढ़ाई अशोक एचएसएस विद्यालय से की, उसके छात्र रजिस्टर में भी यही उल्लेख है। जबकि वर्ष 2015-16 में एसपी सिंह बघेल ने आगरा कॉलेज के सैन्य विभाग में प्रोफेसर की नौकरी पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित पद पर प्राप्त की।
उन्होंने कहा एसपी सिंह पिछड़ा वर्ग के व्यक्ति हैं। कूटरचित तरीके से उन्होंने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल करते हुए 2016 में अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र बनवाया है।
38 प्रमाणपत्र करा चुके हैं निरस्त
शिकायतकर्ता अनिल सोनी ने बताया कि वह धनगर के नाम से बने 38 अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र निरस्त करा चुके हैं। अनुसूचित जाति धनगड़ है। जबकि एसपी सिंह के प्रमाणपत्र पर धनगर दर्ज है। दोनों की अंग्रेजी स्पेलिंग एक जैसी है लेकिन हिंदी में नाम अलग हैं। इस संबंध में उन्होंने निर्वाचन आयोग ने भी शिकायत पर जांच के आदेश जिलाधिकारी आगरा को दिए हैं।
दो चुनाव लड़ चुका... झूठी पाई गई शिकायत
भाजपा प्रत्याशी व केंद्रीय राज्यमंत्री एसपी सिंह बघेल ने कहा कि 10 साल से ऐसे ही हो रहा है। दो चुनाव लड़ चुका हूं। एक बार टूंडला से, एक बार आगरा से। पहले भी शिकायतें की गई थीं। झूठी पाई गईं। तहसीलदार ने प्रमाणपत्र बनाया था। जिसके खिलाफ डीएम की कमेटी में शिकायत की गई। वहां प्रमाणपत्र सही पाया गया। फिर कमिश्नर से शिकायत की गई। वहां भी सही पाया गया।