जब देश में सांप्रदायिक माहौल चिंता का विषय है, ऐसे में यहां दोनों संप्रदायों ने नई परंपरा शुरूकर सद्भाव बनाए रखने की राह दिखाई। यह मिसाल शुक्रवार को सामने आई जब एक ओर भरत मिलाप शोभायात्रा निकलनी थी और दूसरी ओर नौंवी मोहर्रम पर ताजियों का जुलूस उठना था। पहले भरत मिलाप यात्रा निकली जिसका दूसरे संप्रदाय ने इमामबाड़े पर स्वागत किया। बाद में ताजियों का जुलूस निकाला।
दरअसल, यहां चल रही रामलीला के तहत शुक्रवार की रात राम-भरत मिलाप की शोभायात्रा तो उसी दौरान ताजिया कमेटी की ओर से नवी के ताजियों का जुलूस निकाला जाना था। दोनों संप्रदायों के लोगों ने तय किया कि वे असामाजिक तत्वों को ऐसे वक्त खुराफात कर सद्भाव बिगाड़ने का मौका नहीं देंगे। दो दिन पहले हुई बैठक में उन्होंने पुलिस अफसरों की मौजूदगी में इसकी रूपरेखा भी तय कर ली। यह फैसला सबक बना कि दोनों संप्रदाय तय कर लें तो किसी में दम नहीं कि माहौल खराब कर सके।
शुक्रवार को इसे अमली जामा पहनाकर दिखा भी दिया गया। रात को भरत मिलाप शोभायात्रा जब सुनरट्टी में इमामबाड़े के पास पहुंची तो यहां के ताजिया कमेटी के अध्यक्ष अख्तर हुसैन, जमीर हुसैन, मुदस्सिर हुसैन आदि ने रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों का साफा बांधकर जोरदार स्वागत किया। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष हरिओम पांडेय व अन्य पदाधिकारी ताजिया कमेटी के लोगों से गले मिले और खुद को गम ए हुसैन में बराबर का शरीक बताया।
भरत मिलाप का कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद ही ताजिये चौकियों पर रखे गए। उनकी जियारत हुई। इसके बाद जुलाहापुरी से शुरू हुआ ताजियों का जुलूस सराय, सुनरट्टी होकर सुबह चार बजे वापस जुलाहापुरी आकर संपन्न हुआ। शनिवार को ये ताजिए दफनाए गए।
भरत मिलाप शोभायात्रा का स्वागत कर अच्छा लगा। इससे दोनों धर्मों के मानने वालों के बीच भाईचारे की गांठ मजबूत हुई। वैसे भी यहां दोनों समुदाय के लोग एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते हैं। यह परंपरा नजीर बनेगी।
- अख्तर हुसैन, अध्यक्ष, ताजिया कमेटी
मुस्लिम समाज ने जिस सहिष्णुता का परिचय दिया, उसका हार्दिक आभार। इससे दोनों समुदायों के बीच एकता और भाईचारे की बुनियाद मजबूत हुई। भविष्य में हम भी उनके कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर सहयोग करेंगे।
- हरिओम पांडेय, अध्यक्ष, रामलीला कमेटी
आगरा में तो यह होना ही था सुलहकुल की नगरी जो है
आगरा। आगरा सुलहकुल की नगरी है। यह बात जुलूस ए आशूर के मौके पर सामने भी आई। दीगर जगहों पर बवाल हुए मगर यहां हिंदू भी गम ए हुसैन में हिस्सेदार बने। बल्कि दिखाया कि सद्भाव की विरासत कैसे संभाली जाती है। मंटोला क्षेत्र के सदर भट्ठी में हिंदुस्तानी बिरादरी एवं भारत दलित सेवक संघ के सदस्यों ने अजादारों का गला तर करने को शर्बत की सबील लगाई। कबीर पुरस्कार विजेता डा. सिराज कुरैशी और राजकुमार नागरथ ने ताजियेदारों-अखाड़ों के उस्तादों का अभिनंदन किया। डा. कुरैशी ने कहा कि आगरा इसी कौमी यकजहती के लिए जाना जाता है। शिव कुमार शर्मा, रफीक खान, मोहम्मद यासीन, विशाल शर्मा, जियाउद्दीन आदि भी साथ रहे।