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बत्तीस खंभा: कभी था मुगलों का वॉच टावर, अब बन रहा खंडहर, गायब हुए छज्जे और रंगीन टाइल्स; अस्तित्व पर छाया संकट

Wed, 01 Apr 2026 10:52 AM IST
Dhirendra Singh देश दीपक तिवारी ,अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा

सार

यमुना किनारे स्थित ऐतिहासिक ‘बत्तीस खंभा’ स्मारक संरक्षण के अभाव में खंडहर में बदलता जा रहा है। कभी जलमार्ग निगरानी के लिए बना यह मुगलकालीन टावर अब अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
 
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बत्तीस खंभा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की बेरुखी ने यमुना किनारे खड़ी कई ऐतिहासिक धरोहरों को गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया है। यमुना के बाएं तट पर बुलंद बाग में खड़ा बत्तीस खंभा भी यही गवाही दे रहा है। कभी यमुना जलमार्ग पर नियंत्रण के लिए वॉच टावर के रूप में इस्तेमाल होने वाला यह स्मारक आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहा है।
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मंगलवार को अमर उजाला की टीम ने जब इस स्मारक की पड़ताल की, तो विरासत के संरक्षण के दावों की कलई खुल गई। जहां कभी मुगल वास्तुकला की बारीक नक्काशी चमकती थी, वहां अब केवल दरकती दीवारें हैं। प्रसिद्ध पुरातत्वविद एडमंड विलियम स्मिथ ने अपनी पुस्तक मुगल कलर डेकोरेशन ऑफ आगरा में इस इमारत का जिक्र किया है।

 

उन्होंने जो विवरण दिया था, वह आज की जमीनी हकीकत से डरावना अंतर दिखाता है। स्मिथ के अनुसार, यह मीनार पांच मंजिला थी। इसकी चौथी मंजिल पर 24 स्तंभ थे और पांचवीं मंजिल पर एक भव्य गुंबद (छतरी) था, जो आठ स्तंभों पर टिका था। कुल 32 स्तंभों के कारण ही इसे
बत्तीस खंभा कहा गया, लेकिन आज संरक्षण के अभाव में ऊपरी दो मंजिलें पूरी तरह जमींदोज होने के कगार पर आ चुकी हैं।

 

अष्टकोणीय स्मारक की दूसरी मंजिल पर पत्थर के स्तंभों और कोष्ठकों का अद्भुत प्रयोग किया गया था। ये कोष्ठक बाहर निकले छज्जों को सहारा देते थे। आज ये छज्जे पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं, जिससे बारिश का पानी सीधे ईंटों की चिनाई में घुसकर आधारभूत ढांचे को अंदर से खोखला कर रहा है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, यह इमारत कभी कलात्मक प्लास्टर से ढकी थी और इसके कपोल रंगीन टाइलों से सजे थे। आज प्लास्टर का नामोनिशान नहीं है। ईंटें सीधे धूप और बारिश के संपर्क में आकर पाउडर बनकर झड़ रही हैं।


 

मलबे में तब्दील हो गई सीढ़ी
दक्षिण दिशा की वह सीढ़ी, जो कभी धरातल को छत से जोड़ती थी, अब मलबे के ढेर में बदल चुकी है। यह स्मारक के एक बड़े हिस्से के ढहने का स्पष्ट संकेत है। भूतल के केंद्रीय हॉल में बनी बेशकीमती स्टैलेक्टाइट डिजाइन अब सीलन और जंगली झाड़ियों की भेंट चढ़ चुकी है।

 
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बुलंद खान ने कराया था निर्माण
इतिहासकारों के अनुसार, जहांगीर के खास दरबारी बुलंद खान ने 1615-20 के बीच रामबाग के निकट बुलंद बाग बसाया था। तब यह क्षेत्र जल प्रबंधन का उत्कृष्ट केंद्र था, जिसके सात कुएं आज भी मौजूद हैं। नदी किनारे बने इस बत्तीस खंभा टावर का उपयोग तब यमुना में होने वाले यातायात और जलमार्ग प्रबंधन की निगरानी के लिए किया जाता था।
 
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