1926 में वसंत पंचमी का दिन। जेल से लखनऊ कोर्ट के लिये पीली टोपी पहने निकले काकोरी के नायक राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में लखनऊ की सड़कों पर मेरा रंग दे वसंती चोला गूंजा, तो गली कूचों में देश भक्ति का ज्वार फूट पड़ा था। 18 जून 1897 को मुरैना के रुअर बरबाई गांव के मुरलीधर के परिवार में जन्मे राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी ननिहाल बाह के जोधापुरा गांव के चंबल के बीहड़ को अपना क्रांति स्थल बनाया।
पूर्व सैनिक सेवा संगठन भदावर के प्रदेश अध्यक्ष जितेंद्र सिंह भदौरिया ने बताया कि बाह के मई गांव के कमांडर इन चीफ क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित के सानिध्य में क्रांति को नई धार दी। उन्होंने उपेक्षित पड़े क्रांति स्थल से जुड़ी यादों को सहेजे जाने की मांग की। राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने 18 अगस्त 1925 में काकोरी रेलवे स्टेशन पर सरकारी खजाना लूटकर ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती दी थी। मामले में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, राजेंद्र लहरी, रोशन सिंह के साथ आगरा के चंद्रधर जोहरी, चंद्रभाल जोहरी, एटा के बाबूराम वर्मा, मथुरा के शिवचरन लाल शर्मा समेत 40 क्रांतिकारी गिरफ्तार हुए थे।
इतिहासकार डॉ. शिवशंकर कटारे, रामकिशन वैद्य ने बताया कि 1926 में वसंत पंचमी के दिन जेल में बंद क्रांतिकारियों की लखनऊ कोर्ट में पेशी होनी थी। जेल से कोर्ट जाते समय सभी क्रांतिकारी पीली टोपी पहने थे। जेल से कोर्ट की सड़क पर राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में मेरा रंग दे वसंती चोला, हो मेरा रंग दे वसंती चोला, इसी रंग में रंग के शिवा ने मां का बंधन खोला, यही रंग हल्दी घाटी में था प्रताप ने घोला, नव वसंत में भारत के हित वीरो का यह टोला, किस मस्ती से पहन के निकला वसंती चोला, गीत गाते हुये निकले। फिर यह गीत पूरे देश मे गूंजा। दोनों ने बताया कि समूचे मुल्क में यह घटनाक्रम देश भक्ति का ज्वार लाने वाला साबित हुआ। 22 अगस्त 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, राजेन्द्र लहरी, रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। 19 दिसम्बर 1927 को क्रांतिकारी वीर देश पर कुर्बान हो गये।