कासगंज। ‘वृक्ष कबहुं न फल भखै, नदी न संचय नीर, परमार्थ के कारने साधुन धरा शरीर।’ अर्थ है कि वृक्ष कभी भी स्वयं के फल का सेवन नहीं करते और नदी स्वयं का जल ग्रहण नहीं करती, लेकिन ये दोनों जीवन के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। अब वन विभाग द्वारा वृक्षों की विरासत को सहेजने की तैयारी है। वन विभाग ने विरासत के वृक्षों को तलाशने का अभियान तेज कर दिया है।
जिले में कितने पौराणिक वृक्ष हैं? और उनका क्या महत्व है? धार्मिक और ऐतिहासिक किस महत्व से वृक्षों को जाना जाता है? अब इसका ब्योरा वन विभाग के पास मौजूद रहेगा। पौराणिक वृक्षों को विरासत वृक्ष का दर्जा मिलेगा। शासन के निर्देश पर वन विभाग ने पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के वृक्षों की खोज शुरू कर दी है। फिलहाल कासगंज के मां चामुंडा मंदिर के देव वृक्ष पीपल, सोरों का वट वृक्ष, और पटियाली रेलवे स्टेशन के पीपल के वृक्ष का चिह्नांकन किया गया है। वन विभाग इन वृक्षों का महत्व सहेजने के बाद उनके पौराणिक और धार्मिक महत्व की पट्टिकाएं भी प्रदर्शित करेगा।
पंचायती राज विभाग से मांगा सहयोग
वन विभाग ने विरासत वृक्षों को सहेजने के लिए पंचायती राज विभाग से भी सहयोग मांगा है। वन विभाग ने पंचायती राज विभाग को पत्र लिखकर अपेक्षा की है कि सभी ग्राम पंचायत अधिकारियों और सचिवों को निर्देशित कर ग्राम पंचायतवार विरासत वृक्षों का ब्योरा तैयार कराएं।
शासन के निर्देश पर पौराणिक वृक्षों का चिह्नांकन किया जा रहा है। वृक्षों की विरासत सहेजने की पहल की जा रही है। पंचायती राज विभाग के माध्यम से ग्राम पंचायतवार ब्योरा मांगा गया है।
- दिवाकर वशिष्ठ, डीएफओ।