शुरुआत में काम नहीं चला धीरे-धीरे मिली पहचान
मैंने बेटी की ख्वाहिश पर चॉकलेट बनाना सीखा। धीरे-धीरे इसमें इतनी निपुण हो गई कि चॉकलेट के लिए लोग मुझे पहचानने लगे। इसी को कारोबार बना लिया। वर्ष 2016 में दीवाली मेले में चॉकलेट की पहली स्टॉल लगाई। शुुरू में कारोबार नहीं चला लेकिन धीरे धीरे पहचान बनी और ऑर्डर मिलना शुरू हो गए। शुरुआती दिनों में मेरा ध्यान सिर्फ चॉकलेट के स्वाद पर था। फिर पैकिंग, सजावट पर ध्यान दिया। इसके लिए इंटरनेट से मदद ली।
-आरती शर्मा चॉकलेट मेकर
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हंसी उड़ाते थे लोग परिवार ने दिया हौसला
जब मैंने अपने हुनर को क्राफ्ट के रूप में आकार देना शुरू किया तो लोग मेरी हंसी उड़ाते थे। तीन साल से हैंडमेड कार्ड, फेस्टिवल गिफ्ट, पैकिंग, राखी आदि बना रही हूं। लड़कियों को घर में इसे बनाने की निशुल्क क्लास देेती हूं। प्रदर्शनी में स्टॉल लगाती हूं। मैंने लोगों की परवाह नहीं की। परिवारवालों ने मेरा हौसला बढ़ाया। मैंने अब सोशल मीडिया पर अपने सामानों की बिक्री करनी शुरू कर दी है।
-अनुष्का वर्मा, क्राफ्ट आर्टिस्ट
प्रदर्शनी लगाकर काम की शुरुआत की
कोलकाता से जब मैं आगरा आईं तो मार्केट की जरूरत को समझा। 2005 में कोलकाता से कवर मंगाने शुरू किए। शुरुआती दिनों में आगरा के मार्केट को समझने में काफी परेशानी हुई। कोलकाता से माल लेने के लिए अकेले सफर करना पड़ता था। अग्रवाल सेवा सदन, कमलानगर में प्रदर्शनी लगाकर काम की शुरुआत की। कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, नागपुर आदि से ऑर्डर मिलना शुरू हो गए। मैं धीरे-धीरे काम को आगे बढ़ाती रही। -रीता, किट विक्रेता