शिवदत्त गोस्वामी
बटेश्वर। नंदलाल के जन्मोत्सव पर शुक्रवार को मथुरा-वृंदावन समेत देशभर के मंदिर आकर्षक सजावट और दूधिया रोशनी से जगमग रहे। हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की के जयकारों के बीच श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरकते नजर आए, लेकिन जन्माष्टमी के उल्लास के बीच भगवान श्रीकृष्ण के पितामह (दादा) महाराजा सूरसेन की पौराणिक राजधानी शौरीपुर सन्नाटे की चादर ओढ़े नजर आई।
द्वापर युग में शौरीपुर यदुवंशियों का सबसे मजबूत गढ़ और महाराजा सूरसेन की राजधानी हुआ करता था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवकी और वासुदेव के विवाह के समय आकाशवाणी हुई थी कि हे कंस इस देवकी की आठवीं संतान ही तेरा काल होगी। इस आकाशवाणी को सुनकर कंस ने वासुदेव और देवकी को मथुरा के कारागार में डाल दिया था। अगर, यह आकाशवाणी न हुई होती, तो भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में नहीं, बल्कि शौरीपुर के वैभवशाली राजमहल में हुआ होता। जो गौरव, वैश्विक पहचान और भक्ति का सैलाब आज मथुरा-वृंदावन को मिलता है, उस इतिहास के केंद्र में शौरीपुर होता। शौरीपुर आज भी श्रीकृष्ण के इतिहास और यदुवंश के स्वर्णिम काल की जीवंत गवाही दे रहा है।
हला का बाग में बलदाऊ ने चलाया था हल
शौरीपुर में यमुना के निकट हलधर का बाग वही भूमि है, जहां भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ ने स्वयं हल चलाया था। यह स्थान आज भी हला के बाग के नाम से जाना जाता है।
कंस वध के बाद श्रीकृष्ण ने किया था प्रवास
शौरीपुर क्षेत्र में आज भी अति प्राचीन गोकुलनाथ मंदिर और बिहारीजी का मंदिर स्थापित है, जहां द्वापर कालीन परंपराओं के अवशेष मिलते हैं। पाैराणिक मान्यताओं के अनुसार, कंस वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण और बलदाऊ ने लगभग छह महीने तक शौरीपुर में प्रवास किया था।
भगवान नेमिनाथ का भव्य मंदिर
शौरीपुर वर्तमान में जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी की गर्भ और जन्म कल्याणक भूमि भी है, जो इसे सनातन और जैन संस्कृति का एक अद्भुत संगम स्थल बनाता है।
लिखी जा रही विकास की नई इबारत
लंबे समय से उपेक्षित रहे शौरीपुर-बटेश्वर के ऐतिहासिक पन्नों पर अब विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। प्रदेश सरकार और जैन समाज के संयुक्त प्रयासों से इस तीर्थ क्षेत्र का कायाकल्प कर इसे पर्यटन मानचित्र पर भव्य रूप से विकसित किया जा रहा है।