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एक युद्ध पटाखों के विरुद्ध: आगरा में हर दिवाली पर 15,000 लोगों की सेहत बिगाड़ रहे पटाखे

Fri, 30 Oct 2020 03:58 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा

सार

  • अमर उजाला की मुहिम एक युद्ध, पटाखों के विरुद्ध से जुड़कर युवाओं और बच्चों ने इस बार दिवाली पर आतिशबाजी न करने का संकल्प लिया। 
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एक युद्ध, पटाखों के विरुद्ध - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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शहर में 48 चेस्ट फिजिशियन हैं। इनके अलावा एसएन मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल और अन्य फिजिशियन के पास मरीज आए। चिकित्सकों ने बताया कि पटाखों के धुएं से फेफड़ों-सांस नली में संक्रमण का खतरा तीन गुना तक बढ़ गया था। यह पिछले दस सालों से लगभग हर दिवाली की स्थिति है।

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एसोसिएशन ऑफ चेस्ट फिजीशियन ऑफ आगरा के सचिव और एसएन मेडिकल कॉलेज के वक्ष एवं क्षय रोग विभाग के डॉ. जीवी सिंह ने बताया कि बीते साल दिवाली पर एसएन की ओपीडी में 200 से अधिक मरीज रोज आए। इन्हें पटाखों के धुएं से परेशानी थी। 


पूरे शहर में इनकी संख्या एक दिन में लगभग 2500 रही। बाद में संख्या कम हुई लेकिन दस दिनों में लगभग 15 हजार मरीज आए। इनको पटाखों के जलाए जाने से सांस लेने में परेशानी, छाती में जकड़न की दिक्कत हुई। 
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सांस के पुराने मरीजों में धुएं की वजह से सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड गैस सांस नलिकाओं के जरिये फेफड़ों में भर गई, सांस लेने में दिक्कत से अस्थमा अटैक तक पड़ गया।

स्वस्थ लोगों को भी हो जाती है सांस लेने में परेशानी: डॉ. संतोष

एसएन मेडिकल कॉलेज के वक्ष एवं क्षय रोग विभागाध्यक्ष डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि पटाखों के धुएं से अस्थमा-सांस रोगियों की मर्ज बढ़ी हुई मिली। टीबी मरीजों के तो खांसी के साथ खून भी आया। धुआं और जहरीली गैस से स्वस्थ लोगों में सांस फूलने, खांसी, खराश और छाती में जकड़न की परेशानी होने लगती है। ऐसे में पटाखों से बचें तो ही बेहतर है।

कान के पर्दे को पहुंचता है नुकसान, बहरेपन का खतरा: डॉ. आलोक

ईएनटी रोग विशेषज्ञ डॉ. आलोक गुप्ता ने बताया कि 90 से 120 डेसीबल तक आवाज होने तक कान में झनझनाहट हो सकती है। 120-140 डेसीबल तक आवाज होने पर अस्थायी बहरेपन की परेशानी बन सकती है। इससे अधिक आवाज से कान का पर्दा फटने का खतरा है, बहरापन भी हो सकता है। दिवाली पर तेज पटाखों से अधिकांश बच्चों में कान सुन्न होने, झनझनाहट की परेशानी मिलती है।

गर्भस्थ शिशु को ऑक्सीजन की हो सकती है कमी: डॉ. अनुपमा

स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनुपमा शर्मा ने बताया कि पटाखों से निकले धुएं में लंबे समय तक गर्भवती महिला संपर्क में रहती है तो उसके गर्भस्थ शिशु तक खतरनाक गैस दिक्कत कर सकती हैं। इससे ऑक्सीजन की कमी भी हो सकती है। ऐसे में गर्भवती महिलाएं पटाखे चलाने से बचें। जहां पटाखे चल रहे हैं, वहां धुआं और शोरगुल भी अधिक रहता है, ऐसे स्थानों से दूरी बनाएं तो ही अच्छा है।

आतिशबाजी नहीं करने का संकल्प लिया

एक युद्ध पटाखों के विरुद्ध - फोटो : अमर उजाला
कृष्णा कॉलोनी निवासी वंशिका चावला ने कहा कि इस बार आतिशबाजी नहीं करने का मैंने संकल्प लिया है। साथ ही परिवार के लोगों से भी वचन लिया है कि इस बार कोई भी आतिशबाजी नहीं करेगा।

सहेलियों को कर रही जागरूक

कमला नगर की जाह्नवी ने कहा कि बुजुर्गों की  सेहत का ध्यान रखते हुए इस बार मैं आतिशबाजी नहीं करूंगीं। अपनी सहेलियों को भी इस बार ऐसा करने की मना कर रही हूं।

पर्यावरण शुद्ध रखना जिम्मेदारी

काला महल निवासी आयुषी जायसवाल ने कहा कि सर्दियों में वैसे ही शहर का पर्यावरण खराब होने लगता है। पर्यावरण शुद्ध बना रहे, इसलिए दिवाली पर पूरे परिवार ने आतिशबाजी नहीं जलाने का फैसला लिया है।
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कोरोना से लड़ने के लिए जरूरी

बल्केश्वर कॉलोनी निवासी हार्दिक उपाध्याय ने कहा कि वातावरण को शुद्ध बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सभी की है। सभी को सजग रहने की जरूरत है। इसलिए इस बार पटाखे नहीं चलाएंगे।

वीडियो से दोस्तों को दे रहा संदेश

काला महल निवासी निखिल कुमार ने कहा कि दिवाली पर पटाखे नहीं चलाऊंगा। वीडियो के माध्यम से रिश्तेदारों और दोस्तों को आतिशबाजी नहीं करने की सलाह दे रहा हूं।

खेरिया मोड़ निवासी सहज ने कहा कि इस बार पटाखे नहीं चलाएंगे। सहेलियों से इस बारे में बात की तो उनमें से कई ने भी इस बार पटाखे नहीं चलाने का संकल्प लिया है।
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