बारिश ने शहर की प्यासी जमीन की सेहत में कुछ हद तक सुधार किया है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग से डार्क जोन में शामिल नगर क्षेत्र के भूजल स्तर में एक साल के भीतर एक मीटर से अधिक का उछाल आया है। भूजल संकट ग्रस्त शहर में ये आंकड़े संजीवनी की तरह हैं, जो भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत देते हैं।
नगर क्षेत्र में 100 वार्ड हैं। करीब 5000 गली, मोहल्ले व कॉलोनियां हैं, जिनमें 20 लाख से अधिक आबादी रहती है। भूगर्भ जल विभाग की रिपोर्ट के अनुसार नगर क्षेत्र में साल 2024 के मानसून के बाद भूजल स्तर जहां 22.20 एमबीजीएल (मीटर बिलो ग्राउंड लेवल यानी जमीन से नीचे) रिकॉर्ड किया गया था, वहीं 2025 में यह सुधरकर 21.12 एमबीजीएल पर आ गया है। महज एक साल में 1.08 मीटर की यह वृद्धि जल संरक्षण के प्रयासों की बड़ी जीत है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार, शहरी इलाकों में वाटर हार्वेस्टिंग का प्रभावी क्रियान्वयन ही गिरते जलस्तर को थामने का एकमात्र विकल्प है।
39 विभागों के प्रयास और रिकॉर्ड बारिश का कमाल
शहर में विशाल आबादी और औद्योगिक गतिविधियों के कारण संसाधनों पर जबरदस्त दबाव है। इस चुनौती से निपटने के लिए जिला प्रशासन ने प्रोजेक्ट मेघपुष्प-2 के तहत 39 विभागों को जोड़कर वर्षा जल संचयन की व्यापक रणनीति तैयार की। शहर में लगाई गईं रेन वाटर हार्वेस्टिंग इकाइयों और साल 2024 के मानसून में हुई 869.6 मिमी की रिकॉर्ड बारिश (सामान्य से 41.47% अधिक) ने मिलकर जलभृतों (एक्विफर्स) को रिचार्ज करने में मदद की।
अति-दोहन की चुनौती अब भी बरकरार
भूजल स्तर में सुधार के बावजूद खतरा टला नहीं है। आगरा शहर अब भी भूजल दोहन के मामले में अति-दोहित श्रेणी में है। यहां भूजल निकालने की दर 120.22% है, जिसका अर्थ है कि हम संचयन की तुलना में कहीं अधिक पानी निकाल रहे हैं। जिले की भूगर्भीय संरचना में बालू की परतें काफी पतली हैं, जिससे जमीन के नीचे पानी रिसने की प्राकृतिक प्रक्रिया बेहद धीमी है।
मेघपुष्प में बनाईं 8,624 जल संचय संरचनाएं
मुख्य विकास अधिकारी प्रतिभा सिंह ने बताया कि प्रोजेक्ट मेघपुष्प-2 के तहत जिले को डार्क जोन से निकालने के लिए कैच द रेन फ्रेमवर्क के तहत अब तक कुल 13,636 जल संचयन कार्यों को मंजूरी दी गई है। इनमें से 8,624 संरचनाएं पूरी हो चुकी हैं, जिनमें शहरी हार्वेस्टिंग इकाइयां और सोक पिट प्रमुख हैं। इसी का परिणाम है कि जिले के 16 में से 9 क्षेत्रों में जलस्तर सुधरा है।