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आपातकाल को याद कर सिहर आते हैं लोकतंत्र रक्षक सेनानी, पढ़िए उस दौर की कहानी

Tue, 25 Jun 2019 01:22 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
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लोकतंत्र रक्षक सेनानी - फोटो : अमर उजाला
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25 जून 1975 की वो काली रात, जिसे उस दौर के लोग याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं। यह वो रात थी, जब देश में आपताकाल लगा। उस दौरान आगरा के कई लोग जेल गए, यातनाएं सहीं। प्रताड़ना की पराकाष्ठा झेल चुके इनमें से बहुत से लोग अब उस दौर को याद तक नहीं करना चाहते।
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जिले में 153 लोकतंत्र सेनानी हैं। आपातकाल में ये न सिर्फ जेल में रहे बल्कि वहां अमानवीय यातमनाएं तक सहीं। पुलिस से डरकर बहुत से लोग अज्ञातवास पर चले गए। न सरकर के खिलाफ कुछ बोल सकते और न ही प्रचार कर सकते थे। 

शहर में रावतपाड़ा, किनारी बाजार, दरेसी आदि क्षेत्रों में आपातकाल के खिलाफ बगावत के सुर उठते थे। यहां इसके विरोध में लोग संगठित होकर बैठकें करते थे। गुप्तचरों की सूचना के बाद जब तक पुलिस यहां पहुंचती थी, तब तक ये लोग तितर बितर हो जाते थे। फिर भी बहुत से लोग पुलिस के हत्थे चढ़े। 
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खाने में सूखी रोटी दी जाती थी

विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल ने बताया कि आपातकाल के दौरान सबसे पहले संघ के लोगों पर ही शिकंजा कसा गया था। 25-26 जून 1975 की रात को आपातकाल घोषित कर दिया गया। उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि एक दिन में अपने साथियों के साथ लोहामंडी स्थित जाट हाउस से गुजर रहा था। तभी लोहामंडी थाना पुलस ने हमें हिरासत में ले लिया। 

उन्होंने बताया कि मेरी उम्र महज 15 साल थी। हमें जिला जेल ले जाया गया। किशोर अवस्था में होने के बाद भी मेरे साथ कोई रियायत नहीं बरती गई। जेल में खूब पीटा गया। खाने के नाम पर सूखी रोटी दी जाती थी। दिनभर प्यासा रखा जाता था। हमारी सुनने वाला नहीं था। कई दिन बाद हमें छोड़ा गया।

जेल स्टाफ करता था प्रताड़ित

सेवा भारती के विभाग अध्यक्ष वीरेंद्र वार्ष्णेय ने बताया कि वो शुरू से ही आरएसएस की स्वयंसेवक रहे। आपातकाल के दौरान अज्ञातवास के लिए वो ग्वालियर चले गए थे। वहां एक आंदोलन के दौरान सात साथियों के साथ उन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया। तब इनकी उम्र लगभग 26-27 साल थी।
  
उन्होंने बताया कि जेल में खाना नहीं दिया जाता था। मुझे और मेरे साथियों को फांसीघर में बंद कर दिया। पास की कोठी में दूसरे लोकतंत्र रक्षक सेनानी बंद थे। इनसे बात करने के लिए हमने दीवार में छेद कर लिए थे। एक दिन जेल स्टाफ को पता चल गया। इसके बाद हमें खूब प्रताड़ित किया गया। लगभग तीन महीने जेल में बंद रहा। वो दौर याद कर आज भी सिरहन पैदा हो जाती है। 
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