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आगरा की मंडियों का इतिहास: अकबर के दौर में यहां थी रूई की मंडी, आज कपड़ों का बाजार

Mon, 14 Dec 2020 12:06 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
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रूई की मंडी, आगरा - फोटो : अमर उजाला
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मुगल बादशाह अकबर के दौर में बसी आगरा की मंडियों में एक रूई की मंडी की पहचान पूरी तरह बदल चुकी है। अब यहां न रूई धुनने वाले हैं और न ही रूई का व्यापार होता है। नाम रूई की मंडी ही है, लेकिन व्यापार अब कपड़ों का होता है। आसपास की कॉलोनियों और देहात के लिए यह बड़ा बाजार है।

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इतिहासकार राज किशोर राजे ने बताया कि अकबर के दौर में यहां रूई की मंडी के अलावा एक बस्ती बसाई गई जिसका नाम है जोगीपाड़ा। यह साधु-संतों के लिए बसाई गई थी। ये लोग भी पूजा-पाठ के लिए बत्ती आदि बनाने और अन्य काम के लिए रूई की मंडी से रूई लेते थे। 


रूई की मंडी में लोग रजाई, गद्दे, तकिए खरीदने के लिए आते थे। लेकिन मुगल दौर में ही बाद में रुई की मंडी का महत्व कम हो गया। आसपास बाजार और नई बस्तियां बस गईं। अकबर के बेटे नुरूद्दीन मोहम्मद जहांगीर के समय में रूई की मंडी के पास शाहगंज बसा।

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सिंधियों ने शुरू किया था कपड़े का कारोबार 

रूई की मंडी और आसपास के इलाके में लंबे वक्त तक शिया लोग रहते थे। रूई के साथ ही यहां और भी कारोबार होते थे लेकिन देश की आजादी के बाद कपड़े का व्यापार जोर पकड़ गया। 

शाहगंज बाजार कमेटी के महामंत्री महावीर प्रसाद अग्रवाल ने बताया कि आजादी के समय रूई की मंडी शहर का बाहरी इलाका था। बंटवारे के दौरान पाकिस्तान से आए सिंधी लोगों ने यहां कपड़े का काम शुरू किया था। यह व्यापार बढ़ता गया। शुरू में कपड़े की दो-चार दुकानें थी, आज यह प्रमुख बाजारों में से है।
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