बिचपुरी। तहसील किरावली क्षेत्र के गांव कुकथला में फालसा की खेती किसानों के लिए लगातार चुनौती बनती जा रही है। बढ़ती लागत, मजदूरी और बाजार में गिरते दामों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। सीजन की शुरुआत में 150 से 200 रुपये प्रति किलो तक बिकने वाला फालसा अब घटकर 50 से 60 रुपये प्रति किलो रह गया है।
किसान घनश्याम कुशवाह ने बताया कि उन्होंने 40 हजार रुपये प्रति बीघा के हिसाब से दो बीघा खेत किराए पर लेकर फालसा की खेती की है। एक बीघा खेत में तुड़ाई शुरू हो चुकी है और अब तक 12 मंडियां की जा चुकी हैं। रोजाना आधे खेत से करीब 60 किलो फालसा निकल रहा है, जिसे मथुरा मंडी में बेचा जा रहा है। तुड़ाई के लिए प्रतिदिन 10 मजदूर लगाने पड़ते हैं। दूसरे खेत में करीब 15 दिन बाद उत्पादन शुरू होने की संभावना है। वहीं, युवा किसान सत्यम कुशवाह ने बताया कि इस बार फालसा की लकड़ी के दाम गिरने से अतिरिक्त नुकसान हुआ है। पहले लकड़ी का एक बंडल 50 रुपये तक बिक जाता था, लेकिन अब केवल 15 रुपये में बिक रहा है। उन्होंने बताया कि एक मई को पहली मंडी के समय फालसा 150 से 200 रुपये प्रति किलो तक बिका था, लेकिन अब भाव काफी नीचे आ गए हैं। उनके अनुसार एक बीघा फालसा की खेती में करीब 25 हजार रुपये लागत आती है। तुड़ाई के लिए मजदूरों को 300 रुपये प्रतिदिन देने पड़ते हैं और एक बीघा खेत में 15 से 20 मजदूर लगते हैं। किसानों का कहना है कि यदि बाजार में दाम स्थिर रहें तो फालसा की खेती लाभकारी हो सकती है, लेकिन लगातार गिरते भाव से मुनाफा प्रभावित हो रहा है। संवाद
बेमौसम बारिश, गिरते दाम और बढ़ते निर्माण से सिमट रही फालसा खेती
कुकथला गांव के प्रगतिशील किसान मंगल सिंह ने बताया कि क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से लगातार फालसा की खेती घट रही है। हर वर्ष करीब पांच एकड़ भूमि में फालसा कम हो रहा है। उन्होंने कहा कि अब कोई किसान नई फालसा बागवानी शुरू नहीं कर रहा है। इसकी बड़ी वजह बढ़ती लागत, अस्थिर बाजार और मौसम की मार है। मंगल सिंह के अनुसार फालसा सीजन में बारिश होने पर इसके दाम 80 प्रतिशत तक गिर जाते हैं। बारिश से पका हुआ फालसा फटकर खराब हो जाता है। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में जमीनों की खरीद-फरोख्त बढ़ने से भी फालसा की खेती लगातार सिमट रही है। कई स्थानों पर फालसा के बाग उजाड़कर वहां फैक्टरी और कॉलोनियां विकसित कर दी गई हैं।
प्रसंस्करण और औषधीय उपयोग बढ़ाने की मांग
किसान-मजदूर नेता चौधरी दिलीप सिंह ने कहा कि बढ़ती लागत और महंगी तुड़ाई मजदूरी के कारण किसान धीरे-धीरे फालसा की खेती से दूरी बना रहे हैं। उन्होंने केंद्र और प्रदेश सरकार से फालसा आधारित खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा देने, जूस, शरबत और अन्य उत्पादों के निर्माण को प्रोत्साहित करने तथा इसके औषधीय गुणों पर आधारित उद्योग विकसित करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि फालसा को बेहतर बाजार और प्रसंस्करण सुविधाएं मिलें तो किसानों की आय बढ़ने के साथ इसकी खेती भी फिर से रफ्तार पकड़ सकती है।
पिछले पांच वर्षों में फालसा खेती का घटता रकबा
2022 — 70 एकड़
2023 — 65 एकड़
2024 — 60 एकड़
2025 — 55 एकड़
2026 — 50 एकड़
नोट : ये आंकड़े प्रगतिशील किसान मंगल सिंह द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं।