शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता सूरजपाल सिंह ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की सांविधानिकता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल की है। उनका मानना है कि बीएनएस और बीएनएसएस में केवल नाम का बदलाव किया गया है। दंड कभी न्याय नहीं कर सकता, न ही सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है।
अशोक नगर में रहने वाले सूरजपाल सिंह वर्ष 1986 में प्रैक्टिस करते थे। उनका कहना है कि प्रैक्टिस की जगह उन्होंने कानूनों में सुधार के लिए अध्ययन किया। वह आईपीसी और सीआरपीसी में बदलाव के लिए 2014 से ही प्रधानमंत्री कार्यालय, विधि मंत्रालय से पत्राचार कर रहे हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी पत्राचार किया। बाद में उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल की। वहां से मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में भेज दिया गया। इस बीच सरकार ने आईपीसी और सीआरपीसी के स्थान पर बीएनएस और बीएनएसएस लागू कर दिया। इसमें भी दंड के प्रावधान को बरकरार रखा है।
अमर उजाला से बातचीत में कहा कि बीएनएस और बीएनएसएस के लागू होने से कोई फर्क नहीं पड़ा है। महज कवर पेज बदला गया है। यह संविधान के आर्टिकल 21 का उल्लंघन है। अपराध तभी समाप्त होंगे, जब व्यवस्था में सुधार होगा। अपराधी को जेलों की नहीं, सुधार गृह की जरूरत है। वह आठ साल से कानूनों में सुधार के लिए प्रयासरत हैं। उम्मीद है कि हाईकोर्ट में गंभीरता से सुनवाई होगी।