मथुरा के जवाहर बाग कांड को देश-दुनिया में देखने वाले लोग आज भी शायद इसके मुक्ति दूत से अंजान हों। लेकिन, रामवृक्ष के साम्राज्य से जवाहर बाग की मुक्ति में इनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। विपरीत परिस्थतियों में अधिवक्ता विजय पाल सिंह तोमर की कानून को हथियार बनाकर लड़ी गई लड़ाई ने ही पुलिस-प्रशासन को संजीवनी देने का काम किया था।
मथुरा बार के पूर्व अध्यक्ष विजय पाल सिंह तोमर खुद को जवाहर बाग की मुक्ति का हीरो नहीं कहते। जवाहर बाग को लेकर अमर उजाला से फोन पर हुई बातचीत में उन्होंने सबसे पहले इसे मुक्त कराने में शहीद हुए एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और एसओ संतोष कुमार को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद जवाहर बाग की कब्जा मुक्ति के लिए सिलसिलेवार तरीके शुरू की गई अपनी कानूनी लड़ाई के बारे में बताया।
अधिवक्ता विजय पाल सिंह तोमर बताते हैं कि रामवृक्ष और उसकी आर्मी से उनका पहला सामना अगस्त 2014 में हुआ था। उस समय वे मथुरा बार के अध्यक्ष थे और तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के सहयोग के लिए वे जवाहर बाग का निरीक्षण करने गए। रामवृक्ष के लोगों ने उन्हें भी बाग में प्रवेश के दौरान धमकी दी। इस पर उन्होंने बाग को कब्जा मुक्त कराने के लिए कानूनी लड़ाई शुरू करने का निर्णय लिया।
दूसरी बार मथुरा के बार का अध्यक्ष चुने जाने के बाद अधिवक्ता विजय पाल सिंह तोमर ने 20 मई 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में जवाहर बाग को अवैध कब्जे से मुक्त कराने के लिए जनहित याचिका दायर (पीआईएल) की थी। कोर्ट के आदेश के बाद भी जब प्रशासन जवाहर बाग को मुक्त नहीं करा सका तो उन्होंने 22 जनवरी 2016 को अवमानना याचिका दायर की। इस पर हाईकोर्ट की सख्ती के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया और तब जाकर भीषण हिंसा के बीच 2 जून 2016 को जवाहर बाग अवैध कब्जाधारियों से मुक्त हो सका।
अधिवक्ता विजय पाल सिंह बताते हैं कि हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान उन्हें कई बार रामवृक्ष और उसके साथियों ने धमकी भी दीं लेकिन वे डिगे नहीं। जवाहर बाग की पहली बरसी पर वे कहते हैं कि इस लड़ाई के जरिए उन्होंने अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन किया है। वे जवाहर बाग के कोई हीरो नहीं हैं।