फिरोजाबाद। शिक्षा मित्र से सहायक अध्यापक के पद पर समायोजित होने के बाद घर के हालात ही नहीं बदले रहन-सहन भी बदल गया। साइकिल की जगह बाइक और कार ने ले ली। घर में शान-ओ- शौकत आ गई। बच्चे भी प्रतिष्ठा और अच्छी पढ़ाई का प्रतीक माने जाने वाले कान्वेंट और पब्लिक स्कूलों के विद्यार्थी बना दिए।
सपा सरकार ने प्रतिमाह 3500 रुपये पाने वाले 1673 शिक्षा मित्रों को जिस झटके से 38 हजार वेतनभोगी शिक्षक बनाया, सुप्रीम कोर्ट के 25 जुलाई 2017 के फैसले ने वैसे ही झटके में समायोजित शिक्षकों को अर्श से फर्श पर ला दिया है। अब आगे क्या होगा? घर की आर्थिक जरूरत पूरी कैसे होगी? इस उम्र पर नौकरी मिलेगी कि नहीं, ऐेस सवालों ने समायोजित शिक्षकों को अवसाद में ला दिया है।
शिक्षक दंपति ने शहर से नाता जोड़ा तो नौकरी ने साथ छोड़ा
धर्मेेंद्र कुशवाह का प्राथमिक विद्यालय जेदामई और उनकी पत्नी सुनीता का बिलेहना स्थित प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक के पद पर समायोजन हुआ तो घर में 90 हजार रुपये वेतन आने लगा। इससे पहले दोनों शिक्षामित्र के रूप में मात्र 7 हजार रुपये मानदेय पाते थे। 10 गुना से अधिक वेतन होते ही बच्चों के भविष्य की खातिर शहर में आकर रहने लगे। बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ रहे हैं। अब यदि वह सहायक अध्यापक नहीं रहेंगे तो शिक्षा मित्र के पद पर रहते हुए बच्चों की स्कूल और ट्यूशन फीस देना भी संभव नहीं होगा।
पापा की नौकरी छूटी तो बच्चे भी धरना देने पहुंचे
प्राथमिक विद्यालय सलेमपुर में सहायक अध्यापक के पद पर अशोक कुमार का समायोजन हुआ तो गांव में पढ़ रही बेटी प्रार्थना सिंह को मेडिकल, दूसरी बेटी प्रेरणा को इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी करवाने लगे। बेटा अभिनव भी गांव का स्कूल छोड़कर एक नामचीन स्कूल में जाने लगा। 15 हजार रुपये प्रतिमाह बच्चों पर ही खर्च हो रहा है। समायोजन निरस्त होने के बाद बच्चों के भविष्य की चिंता सताने लगी है। गुरुवार को समायोजित शिक्षक अशोक कुमार और उनके तीनों बच्चे धरना स्थल पर पहुंचे। उनका कहना था कि अब हमारे पास कुछ बचा ही नहीं।
अब लग्जरी कार का लोन कैसे चुकाएंगे
प्राथमिक विद्यालय दीदामई में तैनात मोहम्मद शमीम ने बताया कि समायोजन होने के बाद उन्होंने 10 लाख रुपये की कार खरीदी। इसके लिए छह लाख रुपये लोन कराया था। सोचा था नौकरी मिली है तो परिवार को अच्छी सुविधाएं मुहैया कराएं। अब तो कार की किश्त कैसे चुकाएंगे।
होगा बच्चे का इलाज, कैसे बनेगा घर, कैसे होगा
प्राथमिक विद्यालय नगला कृपी में सहायक अध्यापक के पद पर पढ़ा रहे चंद्रपाल सिंह ने कहा कि घर बनवाने के लिए 4.5 लाख रुपये का बैंक से लोन लिया था। दो साल की बच्ची की किडनी में समस्या है तो आगरा में महंगा इलाज करा रहे थे। अब नौकरी नहीं बची तो अब न तो किश्त भरने का इंतजाम है, न ही बच्ची का इलाज कराने को।
लोन लेकर खरीदा घर और प्लाट
प्राथमिक विद्यालय बहुरनपुर में तैनात आशादेवी का कहना है कि सोचा था कि बच्चों के लिए प्लाट लेकर खरीद लें। 3.20 लाख रुपये का लोन कराकर प्लाट खरीदा। घर का सपना पूरा नहीं हुआ। साथ में अब किस्त नहीं भर पाएंगे तो प्लाट कैसे बचाएंगे।
प्राथमिक विद्यालय नगलाबली में सीमा कुमारी ने कहा कि घर बनवाने के लिए लोन कराया। जो बच्चों के भविष्य में भी काम आए। लेकिन अब प्लाट की किश्त कैसे भरेंगे। नौकरी के दम पर घर बनाने का सपना देखा, अब उल्टा कर्जदार भी हो गए।