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शहर की ये सरकार भी फेल

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आगरा। ‘शहर की सरकार’ का पांच साल का एक और सफर पूरा हुआ। मगर, न शहर की तस्वीर बदली और न ही समस्याएं कम हुईं। विश्व पर्यटन के मानचित्र पर तारे की तरह से चमकने वाली ताजनगरी गंदगी, पानी, जर्जर सड़क-गली, खराब स्ट्रीट लाइटें, जलभराव, अतिक्रमण की समस्या से अब भी जूझ रही है। जगह-जगह लगे कूड़े के ढेर और इसके आसपास घूमते आवारा पशु, आज भी मुंह चिढ़ा रहे हैं। नगर निगम के 90 पार्षद और महापौर मिलकर भी शहरवासियों को इन समस्याओं से निजात नहीं दिला पाए। इससे ज्यादा शर्मनाक बात क्या होगी, आजादी के 70 साल बाद भी इस एतिहासिक शहर के बहुत बड़े हिस्से को पानी तक मयस्सर नहीं है। जिन वादों और दावों के साथ महापौर और पार्षदों ने चुनाव जीता था, उन पर वह खरे नहीं उतरे। कई पार्षद दोपहिया वाहन से भले ही चार पहिया की सवारी कर रहे हों लेकिन शहर आज भी वहीं खड़ा है। 16 जुलाई 2012 में महापौर और पार्षदों ने शपथ ली थी। उनका कार्यकाल आज खत्म हो जाएगा। राजीव शर्मा की इस रिपोर्ट से शहर के हालात पर एक नजर...
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मुंह चिढ़ा रहे कूड़े के ढेर
शहर में प्रतिदिन लगभग 800 मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है। मगर, नगर निगम बमुश्किल 400 मीट्रिक टन कूड़ा ही उठा पाता है। हर रोज आधा कूड़ा शहर की सड़कों पर ही पड़ा रह जाता है। शायद की ऐसी कोई सड़क होगी, जिसके किनारे कूड़े के ढेर न लगे हों। निगम के पास इतने संसाधन भी नहीं है कि प्रतिदिन पूरा कूड़ा शहर से उठा सके। इससे संक्रमण का खतरा तो बढ़ता ही है, पर्यटन पर निर्भर शहर की छवि भी धूमिल होती है।

डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन नहीं
शहर में मेट्रो दौड़ाने की तैयारी हो रही लेकिन यहां अब तक डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन तक की व्यवस्था नहीं है। अधिकांश कालोनियों के लोग निजी तौर पर ही सफाई कर्मियों से अपने घर का कूड़ा उठवाते हैं। कई बार प्रयास किए लेकिन एक भी कंपनी टिक नहीं पाई। यहां तक कि मेडिकल वेस्ट तक एकत्रित नहीं हो पाता है।
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कूड़े के पहाड़ का समाधान नहीं
कुबेरपुर पर शहरभर का कूड़ा सालों से डाला जा रहा है। इसकी वजह से यहां कूड़े के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ बन गए हैं। नगर निगम इसके निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं कर पाया है। पूर्व में यहां खाद बनाने का प्लांट लगाया गया था, वह भी बंद हो गया। अब पिछले लंबे समय से कूड़े से बिजली बनाने पर कवायद चल रही है लेकिन यह योजना भी मूर्तरूप नहीं ले पा रही। फलस्वरूप कुबेरपुर में कूड़े के पहाड़ और ऊंचे होते जा रहे हैं।

जर्जर सड़कों से नहीं मिली मुक्ति
शहर की शायद ही कोई ऐसी सड़क होगी जो पूरी तरह से गड्ढा मुक्त हो। गलियों का तो और बुरा हाल है। कई क्षेत्र तो ऐसे हैं, जहां की गलियों से गुजरना दूभर है। पार्षदों ने अपने आसपास की सड़कें तो चमका लीं लेकिन अपने ही वार्ड के अन्य क्षेत्रों की सुध तक नहीं ली। प्रदेश सरकार के गड्ढा मुक्त सड़क अभियान में भी निगम की कोई खास भागीदारी नहीं दिखी।

उफनते नाले-नालियां
शहर में छोटे-बड़े लगभग 300 नाले-नालियां हैं। हर साल इनकी तली झाड़ सफाई के लिए लाखों रुपये का बजट स्वीकृत होता है लेकिन एक भी नाला या नाली साफ नहीं हो पाती। स्थिति यह है कि जरा सी बारिश में ही निगम के इस अभियान की पोल खुल जाती है। कई कालोनियों में तो नालियां ही नहीं बनी हैं।

जलभराव से जूझता शहर
महानगर में शुमार ताजनगरी में जलभराव की समस्या भी सालों पुरानी है। इस रोग की दवा भी वर्तमान शहर की सरकार नहीं कर पाई। सूरसदन चौराहा, रामनगर, तोता का ताल, शंकरगढ़ की पुलिया, पृथ्वीनाथ फाटक, अर्जुन नगर तिराहा, मधुनगर आदि ऐसे तमाम क्षेत्र हैं, जहां जरा सी बारिश के बाद जलभराव हो जाता है। मिनटों की बारिश के बाद लोग घंटों के लिए कैद हो जाते हैं।

अंधेरे में कालोनियां
मुख्य सड़कों को छोड़ दें तो अधिकांश शहर स्ट्रीट लाइट न होने से अंधेरे में डूबा रहता है। कहीं स्ट्रीट लाइट नहीं हैं तो कहीं खराब पड़ी हैं। जबकि मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये का हेरफेर हो जाता है। कई प्रमुख मार्गों पर भी अंधेरा छाया रहता है। इसकी वजह से अपराध भी बढ़ रहे हैं। हादसे होते हैं सो अलग।

पानी को तरसते लोग
इन पांच सालों में भी शहर को पानी की समस्या से मुक्ति नहीं मिल पाई है। अधिकांश क्षेत्रों में वाटर वर्क्स से पानी की सप्लाई ही नहीं हो पाती। भूमिगत जल का स्तर गिर रहा है, वह अलग। ऐसे में शहर में पानी का संकट खड़ा हो रहा है। कई क्षेत्रों में भूमिगत जल खारा होने के कारण लोग वाटर वर्क्स के पानी पर ही निर्भर हैं। यमुनापार का क्षेत्र तो यह दंश सालों से झेल रहा है।

टूर पर रहे महापौर और पार्षद
आगरा। स्टडी टूर के बहाने पार्षदों ने सरकारी धन भी खूब बहाया। मगर, शहर को इसका कोई लाभ नहीं मिल सका। महापौर भी कई बार विदेश यात्रा करने गए। लेकिन उनके इन भ्रमणों का असर नहीं दिखा। एक भी कार्य योजना में कोई बदलाव नहीं लाया गया।

महापौर इंद्रजीत सिंह आर्य अपने कार्यकाल के दौरान कई बार विदेशी दौरे पर गए। इन दौरों का मकसद विदेशों में वहां के नगर निगमों द्वारा किए जाने वाले कार्यों को देखना और उनका अध्ययन कर व्यवस्था को यहां लागू करना था। लेकिन सदन में पार्षदों को एकत्रित कर वहां की कार्यप्रणाली के बारे में अवगत नहीं कराया गया और न ही कोई रिपोर्ट बनी। ऐसा ही हाल पार्षदों का रहा। दो बार देश के ही विभिन्न शहरों के भ्रमण पर गए। इनके भ्रमण का मकसद भी वही था। ये भी शहर को कुछ न दे सके। इन सबका खर्चा नगर निगम ने ही वहन किया था।

पार्टी बदलते रहे महापौर
इंद्रजीत आर्य ने भाजपा की टिकट पर वर्ष 2012 में महापौर का चुनाव जीता था। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। इस पर काफी विवाद खड़ा हुआ लेकिन वह साइकिल पर ही सवार रहे। नगर निगम सदन में सपा का पलड़ा भारी हो गया। तब उनका तर्क था कि शहर के विकास के लिए उन्होंने साइकिल की सवारी की है। 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने एक बार फिल पलटी मारी। भाजपा की लहर देखकर उन्होंने घर वापसी कर ली। इस बार उनका कहना था कि भाजपा छोड़ना उनकी भूल थी।
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