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कान्हा देख अपना वृंदावन, न बची वृंदा और न बचा वन

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वृंदावन में बनीं कालोनियां - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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वृंदावन (मथुरा)। संत हरिराम व्यास ने 17वीं शताब्दी में ही आज के वृंदावन की परिकल्पना को समझ लिया और पद लिखा मथुरा खुदत कटत वृंदावन मुनिजन सोच उपायौ, इतनौ दुख सहवे के काजै, काहै को व्यास जिवायौ। आज शहरों की
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श्रृंखला में वृंदावन भी विकास की दौड़ में शामिल हो गया है। बहुमंजिला इमारतें, पॉश कालोनियां, कॉलेज, होटल, नए-नए मंदिर मठ और आश्रम वृंदावन की पहचान बनते जा रहे हैं।

वृंदावन का पर्यटन हर दिन नई ऊंचाईयों तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है लेकिन इस विकास में वृंदावन अपनी प्राचीनता को खोता जा रहा है। एक समय था जब वृंदावन सघन वृक्षों से अच्छादित था। यहां पग-पग पर वृंदा (तुलसी) के वन, उपवन, ताल-तमाल के दुर्लभ वृक्षों पर लता-पताएं हुआ करती थीं लेकिन समय के साथ वृंदावन का स्वरूप बदला और अब एक नया कंक्रीट का वृंदावन बनकर उभरा है। कान्हा के वृंदावन से वृंदा लुप्त हो गई है।
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तीर्थ नगरी तो बनी पर न बदले हालात

योगी सरकार द्वारा मथुरा वृंदावन को मिलाकर नगर निगम और इस वृंदावन को तीर्थनगरी बनाए जाने के बाद भी यहां के हालात सुधरे नहीं। 68 हजार की आबादी वाला वृंदावन आज भी विकास की राह तक रहा है। हर दिन हजारों श्रद्धालु पर्यटक वृंदावन आते हैं और यही यहां का व्यवसाय और जीविका का मुख्य साधन भी है। लेकिन जर्जर सड़कें, उफनते नाले, गंदगी के ढेर, बंदरों का उत्पात और जाम की समस्या जस की तस बनी हुईं हैं।

विलुप्त हो रहे प्राचीन घाट

बनारस के बाद वृंदावन के यमुना किनारे 32 घाटों की लंबी श्रृंखला थी और इन घाटों से यमुना कल कल बहा करती थी। समय के प्रभाव और आधुनिकता की अंधी दौड़ में यह प्राचीन घाट विलुप्त हो गए। कुछ घाटों के अवशेष मात्र ही रह गए हैं।

वृंदावन का विकास प्राचीनता के समावेश के साथ होना चाहिए। इसकी पहचान इसके प्राचीन स्वरूप से ही है। आधुनिकता प्राचीनता पर हावी न हो ऐसे प्रयास सरकार को करने चाहिए।
- जगन्नाथ पोद्दार, स्थानीय निवासी

मंदिरों की नगरी में देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए आज भी सफाई, सड़क, पेयजल, प्रकाश आदि की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। सरकार को यह व्यवस्थाएं करनी चाहिए।
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-शंभूचरण पाठक, शिक्षाविद्
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