मथुरा। कहते हैं कि महाविद्या देवी मंदिर की स्थापना भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की मां देवकी ने की थी। इसी स्थान पर दोनों भाइयों का मुंडन संस्कार भी कराया था। मुगल शासनकाल में जीर्णशीर्ण हुए इस मंदिर को क्षत्रपति महाराजा शिवाजी ने नया स्वरूप दिया, जो वर्तमान में मराठा शैली को प्रदर्शित करता है।
ब्रज चौरासी कोस और मथुरा पंचकोसीय परिक्रमा मार्ग स्थित महाविद्या में देवी मंदिर के साथ कई ऐतिहासिक और रोचक पहलु जुडे़ हैं। इस मंदिर को द्वापर काल का बताया जाता है। महंत घनश्याम दास का कहना है कि कुलदेवी होने के कारण कृष्ण-बलराम का मुंडन इसी स्थान पर हुआ था। उस वक्त इस स्थल को अंबिका वन के नाम से जाना जाता था। एक साल के अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इसी वन में शरण ली थी। यह वन करीब छह एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ था।
महंत घनश्याम दास बताते हैं कि मुगल शासनकाल में मंदिर की यह प्राचीन इमारत जीर्णशीर्ण हो गई। क्षत्रपति महाराज शिवाजी भी तीन दिन इसी वन में यहां मंदिर पर रहे थे। उसके बाद उन्होंने इसका नवीन निर्माण कराया। मंदिर भवन पर मराठा शैली इसका गवाह है। अंग्रेजी शासन काल में यहां श्रीजी पीठ ने भी निर्माण कार्य कराया है। वर्तमान में मंदिर के साथ कुंड भी स्थित है।
मंदिर में चार प्रतिमाएं
महाविद्या स्थित देवी मंदिर में चार देवियों की प्रतिमाएं विराजमान हैं। इसमें महाविद्या देवी, बंगला देवी, उग्रतार पीताभरा देवी और भैरो बाबा की प्रतिमाएं यहां स्थित हैं।