मथुरा। आधुनिक जीवन शैली की चकाचौंध में खो रही ब्रज की लोक परंपरा को बचाने के लिए 83 वर्षीय मोहन स्वरूप आज भी उसी तत्परता से जुटे हैं, जो जज्बा उनमें 61 साल पहले 22 साल की उम्र में हुआ करता था। इसी की बदौलत ब्रज का लोकनृत्य देश-विदेश तक पहुंचा है। यह मोहन कोई और नहीं, हाल ही में पद्मश्री से सम्मानित मोहन स्वरूप भाटिया हैं।
9 जून 1935 में इसी धरती पर जन्मे मोहन स्वरूप भाटिया का रुझान 22 साल की उम्र में ही ब्रज के ग्रामीण अंचल में आम जीवन से जुड़े लोकगीत, लोक कथा और पर्व परंपरा की ओर आकर्षित हो गया था। संसाधनों के अभाव के बावजूद गांव-गांव तक पहुंचकर ब्रज के लोकगीत, लोक परंपराओं को संग्रहीत करना शुरू कर दिया। रसिया, ढोला, आल्हा का गायन और घूंघट की ओट में जच्चा गीत, विवाह के गीत, सावन की मल्हारें गाने वाली महिलाओं के साथ ब्रज संस्कृति से जुड़े लोगों को संगठित करने में जुटे रहे।
आज उनके पास ब्रज की लोक परंपराओं से जुड़े पांच हजार से ज्यादा गीत संग्रहीत हैं। इनसे जुड़े कलाकारों को उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी जैसे बैनरों के माध्यमों से ब्रज से बाहर निकाल कर देश-विदेश में मंच दिलाया।
ब्रज लोक संस्कृति के लिए लंबी यात्रा करने वाले मोहन स्वरूप भाटिया कहते हैं कि सांची बात तौ जिए कै ब्रज में साहित्य, काव्य और लोक परंपराओं कौ ऐसौ भंडार भरौ परौ है जाए बचाने कूं काऊ कौ ध्यान नाए। जामै तै बहुत कछू तौ पुराने लौगन के संग चलौ गयौ है।
सरकार ने पद्मश्री से नवाजा
ब्रज लोककला और ब्रज लोकनृत्य के लिए लंबी जीवन यात्रा तय करने वाले मोहन स्वरूप भाटिया को इसी साल नरेंद्र मोदी सरकार ने पद्मश्री सम्मान दिया है।