नंदगांव (मथुरा)। बाबा नंद का गांव, सुबह होते ही कान्हा गाय चराने के बहाने राधा प्यारी से मिलने के लिए बरसाना की ओर निकल पड़ते, एक ओर कान्हा दिनभर सखाओं के साथ खेलकूद में व्यस्त वहीं दूसरी ओर शाम तक वापस न लौटने पर मां यशोदा के माथे पर चिंता की लकीरें। द्वापर में कुछ इस तरह की ही तस्वीर थी कान्हा की विभिन्न लीलाओं के साक्षी इस नंदगांव की।
जिला मुख्यालय से करीब साठ किमी दूर राजस्थान बार्डर के समीप बसा नंदगांव आज भी देश-विदेश में अपनी अलग पहचान रखता है। हालातों की बात करें तो करीब 25 हजार से अधिक आबादी वाले इस गांव में आज भी कोई अस्पताल नहीं है। क्षेत्र में पशु अस्पताल न होने के कारण अब इनका पालन भी कम हो गया है।
तीर्थस्थल घोषित होने के बाद भी यात्री सामान्य जन सुविधाओं के लिए तरसते हैं। युवाओं के लिए रोजगार यहां बड़ी परेशानी है। महिला विद्यालय न होने से उन्हें कोसी-बरसाना तक की दौड़ लगानी पड़ती है।
केसी नामक राक्षस से परेशान हो बसाया था गांव
मान्यता है कि गोकुल में कंस के अत्याचारों और केसी नामक राक्षस से परेशान होकर गर्गाचार्य ऋषि के परामर्श से नंदबाबा ने अपने नाम से इस गांव को बसाया। नन्हे कृष्ण प्रथम गो-चारण लीला, गोवर्धन पूजा के लिए गमन, रंग होली, कंस को मारने के लिए अक्रूर के साथ मथुरा गमन, उद्धव गोपी संवाद एवं राधा कृष्ण से जुड़ी तमाम लीलाएं नंदगांव प्रवास के दौरान ही कीं।
यहीं पर भगवान शिव, शनिदेव सहित सूरदास, चैतन्य महाप्रभु, बल्लभाचार्य आदि ने उनके दर्शन किए।