मैनपुरी। 1975 में कांग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल ने पूरे देश को हिला दिया था। मैनपुरी जिला भी इससे अछूता नहीं रहा था। सरकार ने विरोधी नेताओं पर शिकंजा कसा था। उन्हें जेल भेजा था। लेकिन ये दमनकारी नीतियां जनता के लोकतांत्रिक संकल्प को तोड़ नहीं पाईं। आपातकाल के समय मैनपुरी जिले में सात विधानसभा सीटें थीं। 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस इन सभी को हार गई थी, सभी सीटों पर जनता पार्टी के विधायक काबिज हुए थे।
आपातकाल के बाद 1977 में हुए विधानसभा चुनावों में मैनपुरी की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल गई। कई नेताओं ने आपातकाल के दौरान जेल की यातनाएं सही थीं, और उनमें से तीन ऐसे थे जिन्होंने जेल से निकलकर सीधे विधानसभा में अपनी जगह बनाई। इनमें हाकिमलाल वर्मा किशनी विधानसभा से विधायक चुने गए। हरीराम शाक्य भोगांव विधानसभा से जीत हासिल की और रघुनाथ सिंह वर्मा संसद में पहुंचे थे।
आपातकाल का विरोध कर जेल जाने वाले कुल 74 लोगों को बाद में ''''लोकतंत्र सेनानी'''' का दर्जा दिया गया। मैनपुरी में वर्तमान में 45 लोकतंत्र सेनानी जीवित हैं, जिन्हें सरकार द्वारा पेंशन दी जा रही है। लोकतंत्र सेनानी कल्याण परिषद के जिलाध्यक्ष सतीश चंद्र अवस्थी बताते हैं कि 20 लोकतंत्र सेनानियों के निधन के बाद उनकी पत्नियों को यह पेंशन मिल रही है। हालांकि, 9 ऐसे लोकतंत्र सेनानी भी हैं जिनकी पत्नियों का निधन उनसे पहले हो गया था, जिससे सरकारी नीति के तहत उनके परिवारों को कोई लाभ नहीं मिल पाता है। यह लाभ केवल लोकतंत्र सेनानी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी को ही मिलता है।
आपातकाल के समय मैनपुरी जिले में सात विधानसभाएं थीं, जिनमें मैनपुरी सदर, घिरोर, करहल, किशनी, भोगांव, जसराना और शिकोहाबाद। 1977 के चुनाव में इन सातों विधानसभा सीटों पर जनता पार्टी के प्रत्याशियों की जीत हुई थी, जिनमें मैनपुरी सदर से मलखान सिंह यादव, घिरोर से वीरेंद्रपती यादव, करहल से नत्थू सिंह यादव, किशनी से हाकिमलाल वर्मा और भोगांव से हरीराम शाक्य, शिकोहाबाद से गंगाराम यादव, जसराना से बलवीर सिंह यादव विधायक चुने गए थे। जबकि आपातकाल के समय इन सभी सीटों पर कांग्रेस के विधायक थे।