सुरों के सरताज ने खुसरो की सरजमीं को बताया संगीत का मक्का
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कासगंज। हजरत अमीर खुसरो की जन्मस्थली पटियाली में खुसरो भले ही बेगाने हों, उनको लेकर राजनीति हो लेकिन कला के कद्रदान कलाकार उन्हें भगवान मानते हैं। न जाने कितने कवि साहित्यकार और संगीतकार पटियाली में खुसरो की जन्मस्थली पर आकर अपनी कला का तीर्थ करने की ख्वाहिश रखते है। कई कवि और कलाकार यहां आकर अपनी इस ख्वाहिश को पूरा भी कर चुके हैं।
पटियाली के समाजसेवी इशार मियां बताते हैं कि पद्मभूषण महाकवि गोपालदास नीरज करीब छह वर्ष पूर्व पटियाली के कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने आए थे। उन्होंने अपनी व्यस्तता के बीच खुसरो के जन्मस्थान से मिले कवि सम्मेलन के निमंत्रण को स्वीकार किया। वे यहां आए। उनके आने पर जब आयोजक अगवानी कर रहे थे तब कार से उतरते ही गोपालदास नीरज ने सबसे पहले जमीन से मिट्टी उठाई और उसे चूमते हुए माथे से लगाया और बोले आज मेरी कविता का तीर्थ हो गया। यह देखकर आयोजक भी हैरान रहे गए। आयोजकों की हैरानी उस समय और बढ़ गई जब उन्होंने काव्यपाठ करने के बाद पारिश्रमिक लेने से इंकार कर दिया। पटियाली के लोगों के बीच यह चर्चा आज भी होती है। समाजसेवी ने बताया कि करीब डेढ़ वर्ष पूर्व मुंबई के एक बड़े सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल करीम सवा पटियाली आए। उन्होंने खुसरो की स्मृति में बने पार्क और पुस्तकालय को निहारा और वहीं से फिल्मी दुनिया के प्रसिद्ध संगीतकार एआर रहमान को फोन कर उनसे बात कराई। प्रसिद्ध संगीतकार रहमान ने कहा कि हम चाहते हैं कि खुसरो की जन्मस्थली पर हमारा कार्यक्रम हो। सारा खर्चा भी हम ही करेंगे। बस ऐसा हो जाए तो हमारे संगीत का हज हो जाएगा। इसके अलावा फिल्म अदाकार सलमा आगा, संगीतकार जावेद अख्तर भी खुसरो की जमीन पर आने की ख्वाहिश जता चुके हैं। कवि, साहित्यकार, संगीतकार खुसरो की जन्मस्थली की तीर्थ और हज मानते हैं।