प्यास बुझाने को तय करते हैं एक किलोमीटर का सफर
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मैनपुरी। चिलचिलाती धूप हो या फिर हाड़ कंपाने वाली सर्दी, पानी के लिए यहां के लोगों को एक किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। सिर पर पानी के बर्तन रखे ये लोग पैदल ही पानी लेने के लिए जाते हैं। रहने को न तो इनके पास छत है और न ही कोई आय साधन। ऐसे में बस उन्हें इंतजार है तो एक ऐसे नेता का जो उनके दुख दूर सके।
ये दर्द है शहर से चार किलोमीटर दूर बसे गांव सिंकदरपुर की बंजारा बस्ती का। यहां पानी के लिए एक हैंडपंप तक नहीं है। चाहे किसी को प्यास लगी हो या फिर नहाने के लिए पानी लाना हो, इन्हें एक किलोमीटर दूर ही पानी भरने के लिए जाना पड़ता है। यहां रहने वाले आधा सैकड़ा से अधिक परिवार तीन पीढ़ी दर पीढ़ी ये दर्द झेलते आ रहे हैं। हर बार चुनाव में प्रत्याशियों से हैंडपंप लगवाने के लिए हाथ पैर जोड़े, लेकिन कुछ मिला तो केवल झूठा वादा।
झोंपड़ियों में रहने को मजबूर यहां के लोगों को आवास भी नहीं मिल सके। हां दो माह पहले शौचालय बनाकर जरूर खड़े कर दिए गए, लेकिन पानी की किल्लत के चलते इन शौचालयों का उपयोग भी लोग नहीं कर रहे हैं। बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक सब सुबह पानी भरने के लिए जाते हैं। कई बार तो उन्हें खाली हाथ ही वापस लौटना पड़ता है, क्योंकि गांव के लोग हैंडपंप पर पानी नहीं भरने देते हैं। ऐसे में प्यास बुझाने के लिए बंजारे खेतों में ट्यूबवैल का रुख करते हैं।
केवल पानी ही नहीं यहां बंजारों के रहने के लिए सिर पर छत भी नहीं है। झोंपड़ी में रहने वाली 70 वर्षीय पठानी अकेली है। पति की मौत के बाद खाने के भी लाले हैं। पांच साल पहले बनी झोंपड़ी भी अब टूट चुकी है, लेकिन आज तक उन्हें न तो आवास मिल सका और न ही उनका राशन कार्ड बना। यही हाल बंजार बस्ती के अन्य परिवारों का भी है।