घुमंतु लाोग, मतदान देने से वंचित।
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मैनपुरी। मुसाफिर हूं यारों, न घर है ना ठिकाना...। फिल्म परिचय का ये गीत शहर में रहने वाले खानाबदोश समुदाय के लोगों पर सटीक बैठती है। इस समुदाय के किसी भी व्यक्ति के पास वोट देने का अधिकार नहीं है। भले ही वे मैनपुरी की धरती पर रहना, खाना और खेलना सीखा हो। कई ने तो जवानी से बुढ़ापे के दहलीज पर कदम रख दिया है। फिर भी उन्हें वोट देने का हक नहीं मिल सका। उनमें कई लोगों के पास वोटर कार्ड है, लेकिन जब वे मतदान करने के लिए जाते हैं तो उन्हें लौटा दिया जाता है।
शहर के आगरा रोड पर बसी ऐसी ही एक बस्ती में जब रिपोर्टर पहुंचे तो हर किसी ने सवाल दागा। एक युवक ने पूछा कि आपको क्या चाहिए। रिपोर्टर ने कहा कुछ नहीं। इस पर उसने एक सवाल और दाग दिया फिर क्यों आए हैं। रिपोर्टर ने पूछा कि चुनाव में कभी मतदान किया है। इस सवाल पर सब शांत हो गए। तभी झोंपड़ी में लेटे बुजुर्ग मेवाराम की आवाज ने सन्नाटे को तोड़ा। 65 वर्षीय मेवाराम की हालत इतनी खराब थी कि वे उठकर भी नहीं बैठ सकते थे। उन्होंने कहा कि जवानी में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ से मैनपुरी आए थे।
मैनपुरी का हर दस्तूर अपनाया, लेकिन हमें आज तक न अपनाया गया। रोटी कमाने में जवानी कब बुढ़ापे में बदल गई इसका अहसास तक न हुआ। इस बीच वोटर कार्ड तो बना, लेकिन जब भी मतदान करने गए तो लौटा दिया गया। उनकी पत्नी अंगूरी ने बीच में ही बात झपट ली। बोलीं पिछले बार चुनाव में भी हमें वोट नहीं डालने दिया, अब हम वोट डालने ही नहीं जाएंगे। लगभग एक सैकड़ा लोगों वाली इस बस्ती में हर किसी का हाल ऐसा ही था। कह रह थे कि इस बार भी वोट डालने तो जरूर जाएंगे, फिर चाहे कोई लौटा ही क्यों न दे।
बस्ती के लोगों का कहना था कि चाहे कोई भी चुनाव हो प्रत्याशी भी हमारे पास नहीं आते हैं। इस दौरान सड़क के दूसरी ओर बसी बस्ती में रात दिन प्रत्याशियों और उनके समर्थकों का आना जाना रहता है। वे लोगों से वोट की अपील करते हैं, लेकिन हमारे पास आज तक कोई वोट की अपील करने के लिए नहीं आया।