जलेसर। कांग्रेसी विचारधारा को पटखनी देने वाले और भाजपा को शीर्ष पर पहुंचाने में अटलजी ने पूरी जान लगा दी। साहित्य और काव्य के साथ अपने सादगी पूर्ण व्यवहार ने उनको सबका कायल बनाया। कई बार संसद से लेकर सत्ता के गलियारों तक अटलजी को कहा गया कि वे गलत पार्टी में हैं, लेकिन उनका मोह कभी भंग नहीं हुआ। उनका ये व्यक्तित्व मौजूदा राजनीतिज्ञों के लिए प्रेरणा है। आए दिन पार्टियों में कूद-फांद मचाने वाले नेताओं के सामने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी महज एक उदाहरण भर नहीं बल्कि हकीकत हैं। यह हकीकत उन्हीं शख्सियतों में दिखाने की ताकत होती है, जिन्होंने संघर्ष किया हो। राष्ट्रधर्म और राजधर्म के पुरोधा के संस्मरण आज भी लोगों केे जेहन को ताजा कर रहे हैं। जिले में भी अटलजी ने अपने इस राजधर्म का पाठ नेताओं को खूब पढ़ाया है। मिलनसार और सदा एक से व्यक्तित्व के धनी अटलजी ने आपातकाल के दौरान कई बार जलेसर में आकर प्रवास किया। जलेसर के आरएसएस कार्यकर्ता और वृद्ध 87 वर्षीय रामप्रकाश बंसल बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जलेसर में पहली बार 1965 में भाजपा प्रत्याशी माधव नट के चुनाव प्रचार के दौरान आए थे। नगर अध्यक्ष डॉ. हरवल्लभ कौशल निवासी मोहल्ला सराय खानम के आवास पर रुके थे। इस दौरान नगर में अलग ही जोश था। वाकपटुता के धनी अटलजी के भाषण का हर कोई कायल था। वे बताते हैं कि जब उनके घुटने में चोट लगी थी, तो जलेसर के लोग उनसे मिलने दिल्ली पहुंचे। इस दौरान कुछ कांग्रेस नेता उनसे मिल रहे थे। कांग्रेस नेताओं ने अटलजी पर तंज कसा कि अब आप सीधे खड़े नहीं हो पाओगे, झुककर चलना पड़ेगा। इस पर अटलजी का सीधा जवाब दिया कि हम टूट तो सकते हैं, लेकिन झुक नहीं सकते। इसके बाद कांग्रेस नेता चुपचाप लौट गए। साफ है कि पार्टी धर्म का इससे अनमोल उदाहरण और प्रेरणा शायद कोई नेता नहीं हो सकता।
हार में न जीत में, किंचित नहीं भयभीत में ...
भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी कभी भी हार से भयभीत नहीं हुए। आरएसएस स्वयंसेवक सत्यशील प्रकाश मित्तल कहते हैं कि 1965 में विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी माधव नट को तत्कालीन जिलाधिकारी माता प्रसाद ने हेराफेरी कर हरा दिया था। इसके बाद जलेसर के लोग अटलजी से मिलने दिल्ली आवास पर पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने सबको गले लगा लिया था और अपने साथ ही जमीन पर बैठकर खाना खिलाया था। साथ ही अपने आवास पर ही अधिवक्ता को बुलाकर रिट पिटीशन तैयार कराई थी। वे बताते हैं कि खाने के दौरान एक कार्यकर्ता ने अटलबिहारी जी की पुरानी चप्पल को अपने थैले में रखकर उसी स्थान पर नई चप्पल रखी तो उन्होंने उसे प्यार से मना किया कि नई नहीं पुरानी ही ठीक है। जब कार्यकर्ता नहीं माना तो मजबूरी में वे नई चप्पल पहनने को राजी हुए।
स्वयं सेवक, प्रचारकों से भोजन की पूछते थे अटल जी
एटा। स्वादिष्ट भोजन के शौकीन अटल जी कार्यकर्ताओं के खाने का भी ध्यान रखते थे। आवास पर मिलने वाले स्वयं सेवक-प्रचारकों से वे भोजन की पूछना नहीं भूलते थे। ऐसा कहना है कि संघ प्रचारक एवं चार बार भाजपा जिलाध्यक्ष रहे जय प्रकाश पांडेय का।
पुराने संस्मरण सुनाते हुए श्री पांडेय ने बताया कि 1971 में अलीगंज सभा को जाते समय जैथरा में स्वागत के दौरान पहली मुलाकात हुई। इसके बाद प्रचारक, जिलाध्यक्ष, संगठन मंत्री, राष्ट्रीय परिषद एवं किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में बैठकों, सभाओं एवं दिल्ली आवास पर दर्जनों बार भेंट हुई। वे नाम से जानते थे। पांडेय बताते हैं कि एक बार अटल जी ने उन्हें संगठन में मन लगाकर काम करने की बात कही थी।
जलेसर की सभा में माधव के लिए मांगे वोट
1977 में जलेसर में आयोजित चुनावी सभा में विजया राजे सिंधिया के साथ आए अटल जी ने तत्कालीन प्रत्याशी माधव नट के लिए वोट मांगे थे। क्षत्रिय बहुल विधानसभा में अटल जी ने कहा था कि राजमाता अपने पुत्र माधव (माधवराव सिंधिया) के लिए नहीं वरन इस माधव पुत्र (माधव नट) के लिए आपसे वोट मांगने आई हैं। माधव के दामाद रामस्नेही नागर का कहना है कि व्यस्तता के बाद भी अटल जी हालचाल पूछना नहीं भूलते थे। विधायक ससुर के साथ तीन बार अटल से मिले हैं।