मथुरा। लालकिला में स्थापित संग्रहालय को नए सिरे से तैयार किया जा रहा है। इस संदर्भ में डा. रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध संस्थान के सुझावों पर डिजाइन फैक्टरी इण्डिया ने सहमति जताई है। इसमें 1857 की क्रांति को लेकर संग्रहालय को राष्ट्रीय एवं वैश्विक पृष्ठभूमि दिए जाने की बात कही है।
संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष डा. सुरेश चंद्र शर्मा ने कहा कि दफन होने के लिए वतन की दो गज जमीं को तरसते रहे 1857 की जंग-ए-आजादी के अंतिम जांबाज मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वितीय की हसरत अधूरी रह गई हो। लाल किले के संग्रहालय की नई इबारत के जरिए उसे इतने सालों बाद पूरा किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि लाल किले में 1857 के बाबत शोध मूलक प्रयोग नहीं किए गए जिससे आजादी की पहली जंग का पूरा रूप जनता के सामने नहीं आ सका। इसकी घटनाएं लोकप्रिय कथानकों तक सिमट गईं। डा. शर्मा ने प्रस्तावित संग्रहालय में 1857 के बारे में कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से बंगाल व आसाम की गुप्त और प्रकट घटनाओं के प्रदर्शन पर जोर दिया है।
कहा है कि इस क्रांति के प्रदर्शन में आगरा, मथुरा, मेरठ समेत निकटवर्ती इलाकों को भी नजरअंदाज किया गया। इससे राष्ट्रीय क्रांति के असली नायक स्मरणीय नहीं बन सके। मथुरा में अख्तियार खां मंगल पांडे जैसा ही व्यक्तित्व था, जो गुमनामी में रहा।