मैनपुरी। यूं तो मेरा अस्तित्व सैकड़ों वर्ष पुराना है, शुरुआत से ही मैं मैनपुरी का एक अभिन्न अंग रहा हूं। वर्ष 2009 तक मैनें गंगा मैया की नगरी फर्रुखाबाद के लिए सांसद चुनने में अपनी भागीदारी निभाई। इसके बाद मेरा नाता मैनपुरी लोकसभा से जोड़ दिया गया। मुझे लगा कि अब मेरे दिन भी बहुरेंगे, लेकिन हर बार चुनाव में मुझे झूठे वादे करके छला गया।
ये दर्द मेरा अपना है, मैं भोगांव हूं। कहने को तो मयन ऋषि की तपोभूमि का एक हिस्सा होना ही मेरे लिए गौरव की बात है, लेकिन लोकसभा चुनाव में मुझे फर्रुखाबाद के लिए अपनी हिस्सेदारी निभानी पड़ती थी। मेरे मतदाताओं ने कभी इसमें भी कोताही नहीं बरती। हर बार ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर नगर पंचायतों तक सभी ने अपनी भागीदारी निभाई। बात वर्ष 2009 की है जब मुझे मैनपुरी में शामिल कर दिया गया। मैनपुरी में विकास रथ की रफ्तार देखकर मैंने भी कई सपने पाल लिए थे। मुझे पूरी उम्मीद थी कि अब मेरे दिन भी बहुरेंगे, लेकिन हर बार मुझसे छल किया गया। विकास के नाम पर खोखले वादे किए जाते रहे।
मेरे क्षेत्र में बसा गांव नगला मानसिंह। यहां न चलने को पक्की गलियां हैं और न ही जल निकासी को नालियां। जलभराव के बीच से होकर जब लोग गुजरते हैं तो वे मुझे कोसते हैं। खुले में शौच से मुक्त का सपना भी यहां अधूरा है। ये तो केवल एक बानगी मात्र है। ऐसे कई दर्दों से मेरा सीना छलनी हुआ पड़ा है। फिर एक बार चुनावी मौसम आ गया है। लोग आएंगे, बड़े-बड़े वादे करेंगे। सब जानते हुए भी मुझे मौन रहना पड़ेगा, क्योंकि मैं अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। कहते हैं उम्मीद पर दुनिया कायम है। इसलिए मैं बदहाल हूं परेशान हूं पर नाउम्मीद नहीं। मैं भोगांव हूं।
लोगों की बात
हर बार चुनाव में विकास कराने का वादा किया जाता है, लेकिन जैसे ही चुनाव होता है, फिर सभी अपने वादे भूल जाते हैं।
रमेश चंद्र, नगला मानसिंह।
मेरी उम्र 80 वर्ष हो चुकी है। इसके बाद भी मुझे पेंशन नहीं मिल सकी। कई बार आवेदन भी कराया, अब हार मान ली है।
मंगल देवी, नगला मानसिंह।
गांव की गलियों में भरा पानी हाथों से निकालना पड़ता है। तब अहसास होता है कि आज भी हमारा क्षेत्र कितना पिछड़ा है।
गिरीश चंद्र यादव, नगला मानसिंह।
सरकार तो हर बार बस वादे करती आई है। हमें अब सबक सिखाना होगा। अगर विकास नहीं कराया गया तो चुनाव बहिष्कार का रास्ता अपनाएंगे।
सुरजा देवी, नगला मानसिंह।