आगरा। आलू मिट्टी के भाव है, फिर भी इसकी बुवाई साल दर साल बढ़ती गई। पिछले पांच सालों की बात करें तो 14,600 हेक्टेयर खेती बढ़ी है। इस साल तो कीमत न मिलने पर आलू फेंकना पड़ रहा है।
इसके बावजूद इस बार 5000 हेक्टेयर आलू की बुवाई ज्यादा हुई है। अगर इसके निर्यात पर जोर नहीं दिया तो अगली फसल का इससे भी बुरा हाल होने की संभावना है।
2011-12 से 2016-17 में 60,500 हेक्टेयर जमीन पर आलू बोया गया। पैदावार की बात करें तो 14.20 लाख मीट्रिक टन रहा। 2016-17 में आलू की बुवाई बढ़कर 75,100 हेक्टेयर हो गई और पैदावार 21.03 मीट्रिक टन रही।
बीज ज्यादा बचने पर इस बार जिले में करीब 80 हजार हेक्टेयर जमीन पर आलू की बुवाई की गई है। आलू की बिक्री के लिए सरकारी कोई योजना नहीं है, ऐसे में अगले साल इससे ज्यादा हालात बदतर होने की संभावना है।
उत्पादन किसान समिति के महामंत्री मोहम्मद आलमगीर का कहना है कि खरीदार नहीं मिलने पर बीज काफी मात्रा में बचा है, इससे किसानों की बुवाई बढ़ गई है।
प्रसंस्करण यूनिट स्थापित करने के साथ यदि सरकार आलू का विदेशों में निर्यात करे, तभी किसानों का भला होगा लेकिन सरकार और यहां के जनप्रतिनिधि इस पर गंभीर नहीं हैं।
तीन साल से घाटा दे रहा आलू
आलू किसान मानते हैं कि दो-तीन फसल के बाद आलू मोटा मुनाफा देता है, लेकिन पिछले तीन फसलों से आलू घाटे का सौदा बना हुआ है।
2014 में 1000-1200 रुपये प्रति पैकेट (50 किलो), 2015 में 500-600 प्रति पैकेट और 2016 में 500-600 रुपये प्रति पैकेट और नोटबंदी के बाद में 150-200 रुपये में आलू बिका।
आलू किसान विकास समिति के प्रदेश महासचिव पुष्पेंद्र जैन ने बताया कि आलू का समर्थन मूल्य लागत के मुताबिक तय कर इसका निर्यात किए बिना दशा नहीं सुधरने वाली। सरकार इस पर कोई ध्यान नहीं देती।
बाजार में अभी भी 10 रुपये किलो आलू
भले ही आलू को खुले में फेंका जा रहा हो, लेकिन बाजार में पुराना आलू अभी भी आठ-10 रुपये किलो मिल रहा है। अगर प्रशासन इनकी स्टाल लगाकर बांटा जाए तो आम आदमी को भी लाभ मिले और सड़ने पर बीमारियों का भी खतरा नहीं रहे। इस कार्य के लिए सामाजिक संगठन भी पहल कर सकते हैं। घनी बस्तियों और जरूरतमंदों तक आलू पहुंचाया जा सकता है।