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पटाखों के शोर से होंगे बेहाल

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एटा। दिवाली त्योहार पर धूम धड़ाका, पटाखे चलना तो लाजिमी है। खुशियां मनाने के लिए पटाखे चलाए जाते हैं, लेकिन पटाखों का शोर और धुआं हर साल पर्यावरण में जहर घोल रहा है। आबोहवा दूषित होने से बीमारियों में इजाफा हो रहा है।
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दिवाली त्योहार पर हर साल प्रदूषण कई गुना तक बढ़ जाता है। ध्वनि प्रदूषण पर गौर करें तो पटाखों की आवाज कानों को नुकसान पहुंचाने के साथ आकाश छूती नजर आती है। अधिकांश पटाखे 125 से 200 डेसिबल की आवाज में आ रहे हैं, जबकि मानक 100 डेसिबल है। जानकारों की मानें तो 100 डेसिबल की आवाज को साधारण आदमी सिर्फ आठ घंटे ही झेल पाता है।

इसके अलावा वायु प्रदूषण की भी स्थिति यह है कि शहर की आबोहवा में सल्फर डाइ ऑक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड के अलावा संस्पेडेड पार्टीकल्स ऑफ मैटर की मात्रा मानक के अनुरूप 120 माइक्रोग्राम होनी चाहिए, जो कि दिवाली पर कई गुना बढ़ जाती है। साफ है कि मानक से अधिक स्थिति प्रदूषण और इसके विपरीत असर को स्पष्ट करती है। इसलिए लोगों को पर्यावरण का ख्याल रखते हुए पटाखे चलाने चाहिए।
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श्रवण क्षमता होती है प्रभावित
दीवाली पर तेज आवाज के पटाखे चलाने से श्रवण क्षमता प्रभावित होती है। डा. एस चंद्रा बताते हैं कि तेज आवाज से कान का पर्दा और नस फट सकती है। आतिशबाजी से निकलने वाला धुआं अस्थमा, ब्रेन हेमरेज और त्वचा संबंधी बीमारियां पैदा करता है।

पर्यावरण को लगातार हो रहा नुकसान
समाजसेवी प्रदीप रघुनंदन कहते हैं कि पटाखों से पर्यावरण को लगातार नुकसान हो रहा है। वैसे भी प्रकृति मनुष्य से रूठी है। ऐसे में हमें पर्यावरण को संरक्षित करने की जरूरत है। इको फ्रेंडली दीवाली मनाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दें।
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