एटा। कभी ऑक्सीजन का अभाव, तो कभी तबियत बिगड़ने की दलीलें और अंजाम होता है मौत। उनकी लापरवाही किसी का घर उजाड़ देती है, तो किसी के सपने चूर हो जाते हैं, लेकिन लापरवाहों को कोई सबक नहीं। जिले में आए दिन प्रसूताओं और नवजात की मौत के मामलों ने लोगों को परेशान कर दिया है। आलम यह है कि सीएम योगी के सरकारी सिस्टम की नाकामी से हैरत में हैं। जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं का डंका पीटने वाले स्वास्थ्य विभाग की नाकामियों की लंबी फेहरिस्त है। पढ़िए रिपोर्ट....
रेफर एकमात्र विकल्प
जिले में प्रसूताओं और नवजातों को रेफर करने का विकल्प ही अस्पताल प्रशासन ने निकाला हुआ है। संसाधनों की कमी को दुरुस्त करने की बजाय मरीजों को रेफर करके स्वास्थ्य सुविधाएं पटरी पर लाने की बात होती है।
अप्रशिक्षित स्टाफ भी बना बवाल-ए-जान
जिले में कहने को तो अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ की तैनाती है और खूब मोटा वेतन दिया जाता है। मगर वक्त के दौरान स्टाफ के हाथ पांव फूलने लगते हैं। शनिवार को हुई नवजात की मौत के पीछे का कारण कुछ यही है। स्टाफ नर्स से ऑक्सीजन होने के बाद भी नवजात को रेफर कर दिया। साफ है कि स्टाफ नर्स को ऑक्सीजन लगाने की जानकारी नहीं थी।
संवेदनाएं भी मरने लगीं
डाक्टरों को धरती का भगवान कहा जाता है, लेकिन जिले में मौजूदा दौर में भगवान की संवेदनाएं भी सोचने को मजबूर करती हैं। मरीज दर्द और पीड़ा से कराहते रहते हैं, लेकिन धरती के भगवान बेरहम हैं, जो बिल्कुल भी पसीजते नहीं हैं।
कार्रवाइयां सिफर
आए दिन बढ़ रहे मामलों के बाद जांच होती है और कुछ दिन बाद मामला ठंडे बस्ते पड़ा होता है। कोई अधिकारी मामलों की कार्रवाइयों की स्थिति जानने में न तो दिलचस्पी दिखाता है, तो फिर कार्रवाई तो दूर की बात है। ऐसे में विभाग खुद ही अपनों को शह देता नजर आता है।
ये हैं कुछ प्रमुख मामले
31 अक्तूबर 2017- खड़ौआ पीएचसी पर प्रसव के दौरान लापरवाही से नवजात की मौत।
28 मार्च 2017- निजी चिकित्सालय में डाक्टरों की लापरवाही से प्रसूता की मौत।
चार सितंबर 2017- झोलाछापों ने ली प्रसूता की जान।
06 जनवरी 2017- धनराशि नहीं देने पर जिला महिला अस्पताल में मरीज को भर्ती नहीं करने पर रिक्शे में प्रसव।
31 मार्च 2018- प्रसूता को भर्ती नहीं करने पर जिला महिला अस्पताल के गेट पर प्रसव।