मैनपुरी। सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू ए कातिल में है का नारा सुनते ही याद आता ही आजादी के नायक रामप्रसाद बिस्मिल की। उनका जिले से गहरा नाता रहा था। उनका जन्म शाहजहांपुर में हुआ था लेकिन कोसमा में बहन शास्त्री देवी के घर वह काफी समय तक रहे।
इतिहास में दर्ज मैनपुरी षड्यंत्र केस में शामिल शाहजहांपुर के छह युवकों के लीडर बिस्मिल ही थे। उनका जन्म 11 जून 1897 को हुआ था। जिले में काफी समय गुजारने के बाद भी यहां कोई स्मारक नहीं है। 11 जून को उनकी जयंती मनाने तक के लिए कोई संगठन आगे नहीं आया।
11 जून 1897 को शाहजहांपुर में जन्मे रामप्रसाद बिस्मिल ने देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ 11 वर्ष तक संघर्ष किया। काकोरी कांड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को अशफाक उल्ला खां और रोशन सिंह के साथ फांसी दी गई थी। मैनपुरी के मातृवेदी संगठन से जुड़कर उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया और मैनपुरी षड्यंत्र केस में अहम भूमिका अदा की।
बिस्मिल की बहन शास्त्री देवी की शादी ग्राम कोसमा में ठाकुर गंगा सिंह के साथ हुई थी। वर्ष 1917 से 1919 के दौरान बिस्मिल कोसमा और जिले के अन्य हिस्सों में रहे। उन्हीं से प्रेरित होकर कोसमा में 60 से अधिक क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी की जंग में भाग लिया।
मातृवेदी संस्था से जुड़कर क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित, रामप्रसाद बिस्मिल आदि ने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए बड़ी संख्या में हथियार एकत्रित किए। अंग्रेजी सेना को इसकी भनक लग गई और दोनों और से हुई फायरिंग के बाद अंग्रेजों ने काफी हथियार बरामद कर लिए थे। गेंदालाल दीक्षित गोली लगने से घायल हो गए थे। इसे ही मैनपुरी षड्यंत्र केस के नाम से जाना जाता है।
बिस्मिल की बहन शास्त्री देवी ने वर्ष 1969 में उनकी स्मृति में कोसमा के बाहर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल जूनियर हाईस्कूल की नींव डाली और सरकार ने वर्ष 1971 में उसे सहायता प्राप्त विद्यालय की श्रेणी भी दे दी। स्कूल की हालत देखकर लगता ही नहीं कि यह शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की याद में बना स्कूल है।
खंडहर में तब्दील हो चुके स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या भी उंगलियों पर गिनने लायक रह गई है। 1987 में शास्त्री देवी और 1988 में पुत्र हरिश्चंद्र सिंह के निधन के बाद स्कूल की हालत बिगड़ती ही चली गई।