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मजारों पर ‘मेले’ मुसलसल रहे ‘महोदय’

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एटा/जैथरा। कारगिल युद्ध का नाम आते ही उन परिवारों की आंखों में आंसू आ जाते हैं जिनके सपूतों ने इस युद्ध में अपनी कुर्बानी दी थी। पूरा देश गुरुवार को कारगिल दिवस मनाएगा। इस युद्घ में अपनी जान गंवाकर देश को दुश्मनों से बचाने वाले सपूतों ने जिले का नाम रोशन किया, लेकिन आज जिले के शहीद अपनी पहचान को ही तरस रहे हैं। इस युद्ध में जिले के गांव घिलौआ निवासी पुष्पेंद्र और जरारी के उमेश ने शहादत दी थी। बीस साल बाद जिला प्रशासन और वह लोग जो इन सपूतों की शहादत पर गर्व और सीना चौड़ा करते हैं। उन्हें भूल चुके हैं। शहादत के बाद परिवारों को सुविधाएं दीं गईं, लेकिन इसके बाद उनके परिवारों की सुध लेना भी उचित नहीं समझा। पुष्पेंद्र की अब तक कोई प्रतिमा भी नहीं लगवाई गई, गांव में बने समाधि स्थल पर जाने के लिए रास्ता नहीं है, आसपास झाड़ियां उग आई हैं। वहीं शहीद पुष्पेंद्र का परिवार उपेक्षा का शिकार हो गया। परिवार के लोगों को न कोई सुविधा मिली न कोई सम्मान। प्रशासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ी इन शहीदों को जान सके और देश के लिए जान देने के जज्बे को वह भी अपने दिलों में जिंदा रख सकें। आइए डालते हैं एक नजर....
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गुहार लगाते थक चुके परिजन
गांव घिलौआ निवासी शहीद पुष्पेंद्र यादव मात्र 22 साल की उम्र में ही फौज में भर्ती होकर देश की सेवा में लग गया था। कारगिल युद्ध के दौरान वो जम्मू कश्मीर में तैनात था, लेकिन 30 अगस्त,1999 को पुष्पेंद्र यादव पाक सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा पर शहीद हो गए थे। निडर और साहसी जवान पुष्पेंद्र यादव की शहादत के 20 साल बाद भी उनका परिवार मदद को तरस रहा है। शहीद पुष्पेंद्र के समाधि स्थल के आसपास झाड़ियां उग आई हैं। पगडंडी से होकर और कटीले पेड़ों के बीच से गुजरकर परिजन अपने लाड़ले को याद करने पहुंचते हैं। प्रशासन को शहीद के समाधि स्थल के पास सफाई कराने की भी सुध नहीं है। पुष्पेंद्र की मां शांति देवी और पिता शोभाराम यादव शहीद बेटे की प्रतिमा लगवाने और रास्ता बनवाने को लेकर प्रशासन की राह देख अब थक चुके हैं। पिता का कहना है कि शहीद होने के बाद न तो आर्मी के अधिकारियों ने कभी सुध ली और न ही प्रशासन हाल पूछने आया। हालांकि शहीद के नाम पर मिले पेट्रोल पंप का संचालन बड़े भाई करते हैं। पिता को पेंशन मिलती है, लेकिन गांव में मूलभूत सुविधाओं का अभाव परिवार को सालता है। मां शांति देवी कहती है कि गांव के बाहर एक गेट तक नहीं है। साथ ही बिजली बहुत परेशान करती है। बेटे ने शहादत देकर जिले का नाम रोशन किया, लेकिन उसकी समाधि ही रोशन होने को तरस रही है।
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दरकिनार कर दी उमेश की शहादत
कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले जवान उमेश कुमार की शहादत भी दरकिनार कर दी गई है। शहीद के गांव छोटी जरारी में समस्याओं का अंबार है। लाडले के शहीद होने के बाद परिवार को कुछ नहीं मिला। मां कटोरी देवी आज भी पेंशन को भटक रही हैं। पिता सुघड़ सिंह का सुविधाओं के इंतजार में निधन हो गया। माटी के लाल शहीद उमेश को भी प्रशासन ने भुला दिया। शहीद के परिवार ने खुद ही स्मारक बनवाया और प्रतिमा लगवाई। शहीद के घर तक जाने वाला रास्ता भी कच्चा है। हर वर्ष गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर परिवार के लोग ही श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं। पत्नी सुधा देवी बताती हैं कि गांव के बाहर एक द्वार का निर्माण कराना चाहती हूं, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई मदद नहीं है। ग्रामीणों में भी सरकारी उपेक्षा को लेकर रोष है।
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सैनिक कल्याण बोर्ड भी नहीं करता पहल
जिले में भूतपूर्व सैनिकों की सुविधा के लिए सैनिक कल्याण बोर्ड गठित किया गया है, लेकिन वहां भी सैनिकों की समस्याएं हल नहीं हो पातीं। शहीदों की प्रतिमाओं के निर्माण को लेकर बोर्ड को जानकारी तक नहीं है।
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