एटा। जिले में कर्ज के बोझ ने पहली बार किसान की जान नहीं ली है। पहले भी किसान कर्ज की बलि चढ़ चुके हैं। आलम यह है कि सरकारें और रवायतें किसानों को उत्थान को लेकर कोई कदम नहीं उठातीं। ऐसे में किसान आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर होते हैं।
सात मई 2016 को याद करिए, वीर बहादुर की तरह एक और किसान की मौत की दासतां से सिहर उठेंगे। अवागढ़ क्षेत्र के गांव नगला गलू में किसान कमलेश बघेल ने भूख से तड़पकर दम तोड़ दिया था। भूख की तड़प भी इसलिए कि वह कर्ज के बोझ से दबा था, तो झोपड़ी में अन्न का एक दाना तक नहीं बचा। किसान की मौत के बाद खूब आश्वासन दिए गए, लेकिन इसके बाद कोई किसान के परिवार की सुध लेने नहीं पहुंचा। किसानों की मौत पर सियासत होती है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर किसानों को मिलती है तो बस कर्ज का बोझ और मौत। सोमवार को राजा का रामपुर के गांव रामनगर में हुई वीर बहादुर की मौत ने एक बार फिर से सवाल कर दिए हैं। सरकारें कर्जमाफी कर रही हैं, लेकिन किसान फिर क्यों कर्ज के बोझ से दबकर मर रहे हैं? सवाल उठते हैं और दफन हो जाते हैं, लेकिन अन्नदाता की दुर्दशा पर कोई भी पहल करता नजर नहीं आता।
आलू किसान की भी हो चुकी मौत
जलेसर क्षेत्र में 21 जनवरी को आलू किसान ओमप्रताप सिंह की मौत हुई थी। भाकियू नेता ने भी फसल बर्बादी के बाद खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी।
कहते हैं आंकड़े
253000 कुल किसान जिले में
139000 किसान पंजीकृत
42617 किसानों को मिला ऋणमोचन का लाभ
285.43 करोड़ रुपये का किया गया कर्ज माफ