चारों ओर खुले में शौचमुक्त के प्रति जागरूकता अभियान चल रहे हैं। लेकिन भुगतान करने के मामले में स्वच्छ भारत मिशन कमजोर पड़ता जा रहा है। जिले में छह महीने से स्वच्छाग्राहियों को मानदेय नहीं दिया गया है। वो भत्ते के लिए कार्यालय जाते हैं तो उन्हें ब्लॉक से पेय रॉल नहीं आने की बात कही जाती है। इसके चलते उनकी संख्या भी कम होती जा रही है।
जिले को खुले में शौचमुक्त करने के लिए एक बड़ी टीम लगी है। प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ बड़ी संख्या में जिले के युवा स्वच्छाग्राहियों के तौर पर जुड़े हैं। रोजगार की आस में वे गांव-गांव जाकर लोगों को समझाते हैं और प्रेरित करते हैं, लेकिन छह महीने से इनका भत्ता ही नहीं दिया गया है। स्वच्छाग्रहियों को गांव में ट्रिगरिंग के लिए 1200 रुपये दिए जाते हैं। इसके लिए पांच स्वच्छाग्रहियों की टीम एक गांव में जाती है और पांच दिन वहां रुककर लोगों को खुले में शौच से मुक्ति के लिए प्रेरित करती है। मगर जिले में तमाम स्वच्छग्रहियों को यह भत्ता मिला ही नहीं है। स्वच्छाग्राही को शौचालय बनवाने पर 150 रुपये दो किश्तों में दिए जाते हैं। आलम यह है कि जिले में हजारों शौचालय बन चुके हैं, लेकिन अब तक स्वच्छाग्रहियों को भुगतान नहीं हो सका है। आलम यह है कि विभाग ने अभियान के शुरुआती दौर में जिले में 400 स्वच्छाग्रहियों को प्रशिक्षण दिलाया था। जिनकी संख्या अब घटकर 250 रह गई है। जिले में चैंपियनों को गांव ओडीएफ कराने पर दिए जाने वाले 15 हजार रुपये भी नहीं दिए गए हैं।
ये कहते हैं आंकड़े
400 स्वच्छाग्रहियों को दिलाई थी ट्रेनिंग
250 कर रहे काम
1200 रुपये मिलते हैं ट्रिगरिंग के लिए
150 रुपये मिलते हैं प्रति शौचालय निर्माण पर
1300 लाख रुपये खर्च हो चुके मिशन में
9.07 लाख रुपये हुए हैं ट्रेनिंग पर खर्च
1920 लाख रुपये शासन से अप्रैल में जारी