मथुरा। पहले राधाकृष्ण स्वामी, उनके बाद रामचंद्र, फिर रामेश्वर दयाल स्वामी और अब अनिल स्वामी। स्वामी का यह कुनबा पिछले 200 साल से राम-लक्ष्मण तैयार कर रहा है। गर्मियों की छुट्टियों में पात्रों का चयन करते हैं और फिर उन्हें ट्रेनिंग देते हैं। इनके ट्रेंड पात्र श्रीकृष्ण जन्म भूमि पर होने वाली रामलीला में हिस्सा लेते हैं।
एक तरह से रामलीला के पात्रों का ट्रेनर है यह स्वामी परिवार। मई के महीने से ही राम-लक्ष्मण के साथ रामलीला के सभी प्रमुख पात्रों के लिए चयन शुरू हो जाता है। स्कूलों में जाते हैं। कालोनियों में संपर्क करते हैं। इनकी तलाश होती है ऐसे बच्चों की जो आकर्षक हों और राम-लक्ष्मण की भूमिका को निभा सकें। उनके भीतर एक भाव झलके।
द्वारिकाधीश मंदिर के पास रहने वाले अनिल स्वामी का कहना है कि उनके परिवार में वर्षों से परंपरा चली आ रही है। अब रामलीला के पात्र तैयार करने की परंपरा को वह निभा रहे हैं। वह केवल जन्मभूमि पर होने वाली रामलीला में ही अपने पात्र देते हैं। उनके सिखाए पात्र बाद में कई दूसरी रामलीलाओं में भी मंचन करते हैं। उनका कहना है कि रामलीला के कलाकारों को ट्रेनिंग देने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है लेकिन जब उनके सिखाए कलाकार बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो उनकी सारी मेहनत वसूल हो जाती है।
रिटायर होते हैं राम-लक्ष्मण भी
मथुरा। राम और लक्ष्मण भी रिटायर होते हैं। यहां राम और लक्ष्मण के बाल स्वरूप की लीला की जाती है। पंद्रह साल तक की उम्र के ही राम और लक्ष्मण बनाए जाते हैं। जैसे ही इनके मूंछ जमनी शुरू हो जाती है इन्हें रिटायर कर दिया जाता है। इनके स्थान पर दूसरों को तैयार किया जाता है। आयोजकों का कहना है कि बाल स्वरूप में ही भाव आता है। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उस तरह का भाव नहीं आ पाता। इसलिए अधिक उम्र के पात्र नहीं बनाए जाते हैं। जब यह बड़े हो जाते हैं तो दूसरी रामलीला मंडलियों में मंचन करते हैं। शहर की कई रामलीला मंडलियों में उनके सिखाए कलाकार रामलीला कर रहे हैं।