मैनपुरी। इमरजेंसी का काला दौर याद कर आज भी लोकतंत्र सेनानियों की रूह कांप जाती है। कांग्रेस शासन में थाने से लेकर जेल तक हुए उत्पीड़न को भूलना अभी भी उनके लिए संभव नहीं है। सत्ता के खिलाफ बोलने पर लगाई गई पाबंदी को तानाशाहीपूर्ण निर्णय मानकर लोकतंत्र सेनानी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तुलना हिटलर से ही करते हैं।
लोकतंत्र सेनानी परिषद के अध्यक्ष सतीश अवस्थी बताते हैं कि यातनाओं के दौर में पांच महीने जेल में गुजारे। जून 1975 में जारी वारंट के आधार पर पुलिस ने परिजनों को पकड़ा तो वारंटी साथी नेकराम, मथुराप्रसाद, जागन सिंह, मौजीराम के साथ 24 दिसंबर 1976 को भोगांव में आलूमंडी से थाने तक नारेबाजी कर पैदल मार्च किया। थाने में उत्पीड़न कर पुलिस ने जेल भेजा। सत्याग्रह के बाद बी श्रेणी की सुविधा मिली। पांच महीने बाद मां की बीमारी के चलते उनको हाईकोर्ट से पैरोल मिली।
भाजपा नेता शिवओंकार नाथ पचौरी कहते हैं इमरजेंसी में तो अपने भी साथ छोड़ गए थे। भारतीय युवा संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष होने के नाते उनको भूमिगत रहकर आंदोलन करना था। वारंट जारी होने के कारण आंदोलन के दौरान ही डीआईआर के तहत 19 नवंबर 1975 को शिकोहाबाद में पकड़े गए। 18 जनवरी 1976 को मीसा के तहत फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेजा गया। 14 महीने तक जेल में रहना पड़ा। उनके साथ भाजपा के दिग्गज नेता रामप्रकाश त्रिपाठी, ब्रहमदत्त द्विवेदी भी फतेहगढ़ जेल में ही रहे। ताऊ की मौत होने पर उनको पैरोल मिली।
अखिल भारतीय वैश्य एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. सुमंत गुप्ता बताते हैं कि इमरजेंसी में बोलने की आजादी पर पाबंदी थी। थाने से लेकर जेल तक उत्पीड़न होता था। वारंट जारी होने पर 15 अगस्त 1975 को शिवनरायन दुबे सहित पांच वारंटियों को साथ लेकर बड़े चौराहे से कोतवाली तक नारेबाजी कर पैदल मार्च किया। थाने में यातनाओं के बाद जेल भेजा गया। बाद में मीसा के तहत नैनी सेंट्रल जेल भेजा गया। जेल में गृहमंत्री राजनाथ सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव भी जेल में रहे।
सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को खुद इमरजेंसी की यातनाओं के दर्द का अनुभव है। अखिलेश सरकार ने सम्मान देकर 15 हजार प्रतिमाह पेंशन, यात्रा और चिकित्सा सुविधा, अस्पताल में दवा न होने पर लोकल परचेज की सुविधा दी। राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि और बाद में पत्नी को पेंशन दिए जाने का प्रावधान भी किया गया है।
आपातकाल का विरोध कर जेल जाने वाले जिले के 80 लोकतंत्र सेनानी रहे हैं। जिनमें से 16 की मौत हो चुकी है। उनकी पत्नी को पेंशन देने के लिए शासन ने उनका ब्यौरा तथा पेंशन देने में खर्च होने वाले बजट का विवरण मांगा है। तहसील भोगांव से पांच, कुरावली से तीन, करहल से एक फाइल तैयार की गयी है। 64 लोकतंत्र सेनानियों को सरकार से पेंशन मिल रही है।