मथुरा। बाल अवस्था में गोकुल में रहे कन्हैया के साथ आज भी उनसे बड़ी उम्र की गोपिकाएं यमुना किनारे होली खेलती हैं। कन्हैया को पहले डोला में बिठाकर स्वागत सत्कार के साथ लाया जाता है फिर रंग गुलाल बरसाते हुए गोपिकाएं छड़ियों से उन्हें पीटती हैं। करीब पांच सौ साल पुरानी होली की यह परंपरा आज भी गोकुल में निभाई जा रही है।
जन्म के बाद वासुदेव कृष्ण को कंस से बचाने के लिए नंदबाबा के घर गोकुल में छोड़ जाते हैं। बाल अवस्था में कृष्ण गोकुल में अनेक लीलाएं करते हैं। यह परंपरा आज भी निभाई जा रही हैं। इसमें होली खेलने की परंपरा भी शामिल है। गोकुल स्थित मंदिर नंदभवन से पहले तो कृष्ण को डोला में बिठाकर यमुना स्थित मुरलीधर घाट ले जाया जाता है। डोला के साथ बड़ी संख्या में गोपिकाएं भी मुरलीधर घाट पहुंचती हैं। इस दौरान नफीरी के स्वरों के बीच गोकुलवासी फूलों की बरसात करते हैं।
मुरलीधर घाट पर कृष्ण को गोपिकाएं छड़ियों से पीटते हुए टेसू के रंग से सराबोर करती हैं। देश-विदेश से आने वाले भक्त भी इस रंग में सराबोर होते हैं। इसी के बाद रंग गुलाल की होली की शुरूआत गोकुल में हो जाती है। मंदिर नंदभवन तक पहुंचने तक जमकर गुलाल उड़ाया जाता है। गोकुल में होली को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं।
गोकुल में होली खेलने के लिए बड़ी दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। एक दिन पहले ही लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। मंदिर के मैनेजर गिरधारी भाटिया ने बताया कि इस बार यह आयोजन 27 फरवरी को होगा। इसकी तैयारियां शुरू हो गई हैं।