अदालत में न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले वादकारियों के लिए मुकदमों का लंबा खिंचना किसी सजा से कम नहीं है। नेशनल जुडिशियल डाटा ग्रिड के अनुसार जिले के अलग-अलग अदालतों में कुल 4,93,557 मुकदमे लंबित हैं। करीब 50 हजार मुकदमे तो वकील नहीं होने की वजह लंबित हैं। गवाही और अभियुक्तों के फरार होने के कारण भी फैसले की राह में रोड़ा बने हुए हैं।
सबसे ज्यादा मुकदमों के लंबित होने की वजह अधिवक्ता का उपलब्ध नहीं होना है। ऐसे 49,800 मुकदमे लंबित हैं। इसके बाद 32,157 मुकदमे अन्य कारणों से स्थगित हैं। 24,957 मुकदमों में आरोपी फरार हैं, जबकि 20,393 मामलों में गवाहों के कारण सुनवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसके अलावा 8,476 मामलों में पक्षकार रुचि नहीं ले रहे। 2,956 में दस्तावेजों का इंतजार, 834 हाईकोर्ट के स्थगन आदेश, 400 में बार-बार अपील, 169 में एलआर (कानूनी प्रतिनिधि) रिकॉर्ड पर नहीं है। 147 मामलों में अधिक गवाह होने की वजह से सुनवाई लंबित है। रिकॉर्ड उपलब्ध न होने से 39, विविध प्रार्थनापत्रों से 12, जिला अदालत के स्थगन से 11, सुप्रीम कोर्ट के स्थगन से चार और डिक्री के निष्पादन से तीन मामले अटके हुए हैं।
केस: 1
थाना फतेहपुर सीकरी में दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, 1 जून , 2011 को तत्कालीन थानाध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह ने तहरीर देकर आरोप लगाया था कि 23 मई, 2011 की रात गांव कौरई स्थित नमस्कार ढाबा पर हुए चौहरे हत्याकांड के बाद सांसद राजकुमार चाहर, विधायक बाबूलाल, पूर्व विधायक उम्मेद सिंह, ब्रजेश चाहर ने नगला बौरा के पास महापंचायत बुलाई थी। बबाल हुआ था। पुलिस पर जानलेवा हमला हुआ था। पुलिस ने करीब 50 नामजद और सैकड़ों अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या की कोशिश, सरकारी कार्य में बाधा व अन्य आरोपों में प्राथमिकी की दर्ज की थी। 23 जुलाई, 2011 को विवेचक ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। साक्ष्य न होने की वजह से मुकदमा एसीजेएम-7 की अदालत में लंबित चल रहा है। 21 सितंबर को अगली सुनवाई होगी।
केस:-2-
दयालबाग स्थित शिक्षण संस्थान में 15 मार्च, 2013 को हुए शोध छात्रा हत्याकांड को 13 साल से अधिक समय हो गया। छात्रा के पिता न्याय के लिए लड़ रहे हैं। अब तक 250 से ज्यादा तारीखें पड़ चुकी हैं। मुकदमा अपर जिला जज पुष्कर उपाध्याय की अदालत में लंबित है। 5 सितंबर, 2026 को अगली सुनवाई है। पिता ने बताया कि अभियोजन की तरफ से 50 लोगों की गवाही हो चुकी है। हर साल करीब 25 तारीख लगती हैं। वह अधिकतर में पैरवी के लिए आते हैं। वर्ष 2016 से तारीखों का सिलसिला चल रहा है। जैसा मेरे साथ हुआ वो किसी के साथ नहीं होना चाहिए। उन्हें न्याय का इंतजार है।
समय से गवाही देने नहीं आते सरकारी गवाह
विशेषकर सरकारी गवाहों की गवाही समय से नहीं होने के कारण न्यायिक व्यवस्था प्रभावित होती है। दोषी साबित होने पर तो दंड मिलता ही है लेकिन आमतौर पर दशकों तक न्याय की आस में अपनी सारी जवानी खपाने के बाद यदि निर्दोष व्यक्ति बरी होता है तो उसके बर्बाद जीवन पर कोई निर्णय नहीं किया जाता है।
अजय चाहर, एडवोकेट, प्रवक्ता, आगरा एडवोकेट्स एसोसिएशन