लखनऊ। दोस्ती..। बस एक शब्द ही काफी है ये बयां करने के लिए कि यह शब्द अपने आप में कितना मजबूत है। इस शब्द पर कुछ लोग तो इतना भरोसा करते हैं कि दोस्ती के लिए उनका सब कुछ हाजिर रहता है। दोस्तों की इस दोस्ती के लिए जितना भी कहा जाए और जितना किया जाए सब कम है। अक्सर खून के रिश्तों पर भी ये शब्द भारी पड़ता है। यारों की ऐसी मिसालें कि जिन्हें सुनने में दिन से रात और रात से दिन हो जाए। अगस्त के पहले रविवार पर मनाए जाने वाले दोस्ती के जश्न ‘फ्रेंडशिप डे’ के मौके पर ‘अमर उजाला’ ने शहर के ऐसे ही कुछ चर्चित चेहरों से जाना उनकी दोस्ती की ताकत और दोस्ती के मायने।
उसका हाल जाने बिना दिल को नहीं मिलता चैन
जब दोस्तों की बात चलती है तो सबसे पहले यारों का यार मेरा जिगरी दोस्त का चेहरा मेरे सामने आ जाता है। वो दोस्त है सीडीआरआई में मेरे साथ अरसे तक काम कर चुके डॉ. आरसी गुप्त। वो और मैं साथ काम ही नहीं करते थे, बल्कि एक-एक लम्हा साथ जीते थे। आलम ये था कि हम एक-दूसरे की बात आंखों के इशारे से ही समझ जाते थे। यही एक जज्बा हमारी दोस्ती की जान रही। चाहे पोर्ट ब्लेयर जाना हो, दुबई की सैर करनी हो या साउथ ईस्ट एशिया घूमना हो। न अकेले मेरा जाने का मन किया और न ही उसका। जहां भी गए साथ ही गए। कोई दुख-दर्द का जब तक अहसास हो, उससे पहले ही उसे अपने साथ खड़ा पाया। पहले दिन से आज तक यही जज्बा कायम है। दिन में जब तक एक बार उसकी आवाज न सुन लूं, हालचाल न जान लूं तब तक ऐसा लगता ही नहीं दिन भी शुरू हुआ है। यही सबसे बड़ी ताकत है, हमारी दोस्ती की।
- डॉ. अनिल रस्तोगी, वरिष्ठ रंगकर्मी
मेरे हर कदम की आहट है उसे
वाइल्ड लाइफ से जुड़े एक पर्सन के तौर पर कोई भी वन्यजीव मेरा पहला प्यार हैं, लेकिन उसके इतर मेरा यार परमजीत सिंह (वन संरक्षक कुमाऊं) मुझे सबसे प्यारा है। बीते 15-18 सालों में शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब हमने फोन पर एक-दूजे का हालचाल न लिया हो। दोस्ती के इससे बड़े मायने नहीं हो सकते कि मेरा रेस्क्यू ऑपरेशन कैसी भी स्थितियों में चलता रहे वो खबर लेता रहता है। हम जब भी साथ होते हैं तो समय चुटकियों में बीत जाता है। हमारी दोस्ती उतनी ही ताजी है जितनी कि पहले दिन थी। दोस्ती के इससे बेहतर मायने नहीं हो सकते कि दोस्त आपके साथ खड़ा रहे। सुख हो या दुख। कभी-कभी तो ऐसा भी हुआ है कि दिमाग में बस दोस्त से बात का ख्याल आया और अगले ही पल उसका फोन आ गया। यही है एक सच्ची दोस्ती की ताकत। आज भी ये अहसास वैसा ही है जैसा पहले दिन था, कोई बदलाव नहीं आया।
- डॉ. उत्कर्ष शुक्ला, डिप्टी डायरेक्टर, लखनऊ जू
दोस्ती में कोई समझौता नहीं
मेरा दोस्त है खालिद असरार फारुकी। पहली बार 1978 में साथ हॉकी खेलते हुए दोस्ती हुई और हम दोनों ता जिंदगी एक-दूजे के हो गए। तब एक हॉस्टल के रूम में हम साथ ही रहते। उसके वालिद मरहूम हमारे लिए हर महीने 4 किलो देसी घी और भारी मात्रा में शामी कबाब लाते और हम खाते। दोस्ती का पहला नियम है मन का हर कोना साफ रहे और एक भी सेकंड के लिए कहीं से मन में कोई शक न रहे। दोस्ती इसी से बचकर हमेशा फलती-फूलती रहती है। वो भले ही आज बिजनौर में रहता है और अपने जिले का बड़ा कारोबारी है, लेकिन मेरा वही पुराना दोस्त है। आज 35 साल हो चुके हैं, लेकिन किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं आया। दोस्ती की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उसमें कहीं से भी कोई समझौता न आने पाए। जहां नफा या नुकसान दोस्ती में आया वहां दोस्ती फिर एक बिजनेस हो जाती है।
- सुजीत कुमार, ओलंपियन हॉकी खिलाड़ी
दोस्त को मुंबई जाकर बांधा फ्रेंडशिप बैंड
उसका अहसास ही खास है मेरे लिए। तभी तो इतनी दूर होते हुए भी वो मेरे बिल्कुल नजदीक है। माई बेस्ट फ्रेंड नेहा शुक्ला भले ही इस समय मुंबई में हो, लेकिन दिन का हर लम्हा उससे साझा होता है। स्कूली दिनों की ये दोस्ती आज भी वैसे ही है जैसे तब थी। एक दोस्त का दूसरे के लिए सरल स्वभाव और याराना निभाने का अंदाज ही दोस्ती का असली मायने है। तभी तो हम अक्सर एक -दूसरे को अपने काफी करीब पाते हैं। फ्रेंडशिप डे से पहले मैं उससे मिलने मुंबई गई थी, उसे फ्रेंडशिप बैंड बांधा। एक-दूसरे के लिए हमेशा ही तैयार रहने का ये जज्बा ही तो दोस्ती की असली जान है। न ये अंदाज बदला है और न ही बदलेगा।
- नीतू अरोड़ा, कंपनी सेक्रेटरी
दोस्त पर है अटूट भरोसा
दोस्त की राय के बिना मैं कोई फैसला नहीं लेता। यह दोस्त है मेरे सहकर्मी यूनिवर्सिटी के डीन प्रो. एपी तिवारी। वे साथ रहें तो दिन हंसते-खिलखिलाते बीत जाता है। दोस्ती में कभी कोई समझौता या ऊंच-नीच नहीं देखा हमने। यही एक कारण रहा कि याराना मजबूत है। दफ्तर की परेशानियां हो, घर की कोई दिक्कत हो, कैसी भी मुसीबत हो, हम लोग साथ मिलकर ही सुलझाते हैं। हम दोनों की सोच एक-दूसरे से इस कदर मिलती है कि वो और मैं अभी तक ‘हम’ ही बने हुए हैं। इतने सालों में हमारी दोस्ती के मायने एक परसेंट भी नहीं बदले। इस दोस्ती को ताकत मिलती है भरोसे से, जो हम एक-दूसरे पर अटूट करते हैं।
- एसके श्रीवास्तव, सचिव, विकलांग कल्याण और रजिस्ट्रार डॉ. शकुंतला विवि।
आज भी जारी है 24 साल की यारी
यारी हो तो हमारे जैसी। जैसी पहले दिन थी, वैसी आज भी जारी है ये यारी। ये दोस्त है डॉ. शशिप्रकाश मौर्य, जो 24 साल पहले मुझे मिले। पहली दफा उनसे मिलकर लगा कि बस अपना हमदम अपना दोस्त मेरा ही चोला पहन कर आ गया। जैसी मेरी सोच वैसे ही उसकी। यही एक कारण रहा कि हमारी दोस्ती आज भी मजबूत है। भले ही हम एक जैसे प्रोफेशन से जुड़े हैं, लेकिन पॉजिटिव प्वाइंट ये है कि हम हर मुद्दे पर साथ घंटो बैठ सकते हैं। एक दोस्त के साथ इससे बेहतर आप को और क्या चाहिये। मेरे हिसाब से दोस्ती के मायनों में सुख-दुख में साथ खड़े रहने के अलावा विचारधारा का मिलना बहुत जरूरी है। हमारी बात मिलती है, दिल मिलते हैं। यही सबसे बड़ा फैक्टर है। ये तब बदले न अब तक। मैं भी मानता हूं और मेरा दोस्त भी। यही दोस्ती की सबसे बड़ी ताकत है।
- डॉ. सुरेश कुमार, पल्मोनरी सर्जरी यूनिट हेड केजीएमयू