लखनऊ। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्पताल में हुई हड़ताल के मामले की जांच स्वास्थ्य विभाग ने सीएमओ को सौंपी है। बुधवार को जांच के लिए सीएमओ सिविल अस्पताल भी पहुंचे। हालांकि उन्होंने मरीजों व तीमारदारों में किसी के बयान नहीं लिए। ऐसे में इस जांच पर तीमारदारों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। आरोप है कि कर्मचारियों व डॉक्टरों की हड़ताल के बाद इलाज के अभाव में तड़प रहे मरीजों के तीमारदार जब रोते हुए सीएमएस के कार्यालय पहुंचे थे। उस दौरान सीएमओ भी सीएमएस व एमएस के साथ एसी कमरे में बैठे थे, लेकिन किसी की कोई सुनवाई नहीं हुई थी। सिविल अस्पताल में हड़ताल से हुई तीन मरीजों की मौत के मामले की जांच करने बुधवार को सीएमओ डॉ. एसएनएस यादव पहुंचे। डॉ. यादव ने हड़ताल के दौरान तड़प-तड़प कर मरने वाले बाराबंकी के रामसनेही घाट निवासी अशोक तिवारी की मौत की वजह पर गौर नहीं किया। उसके परिवार वालों ने लिख कर दिया था कि इलाज न मिलने से मौत हुई है। जिसके रिकार्ड अस्पताल में मौजूद हैं। वार्डों में भर्ती मरीजों के तीमारदारों का कहना है कि सीएमओ हड़ताल वाले दिन की तरह ही जांच करने की बजाए सीधे सीएमएस कार्यालय पहुंच गए। वहां काफी देर तक बैठने के बाद भर्ती पुराने मरीजों के बयान लिए बगैर लौट गए। इन मरीजों को हड़ताल से काफी समस्याएं हुई थीं। तीमारदारों ने इस तरह जांच के नाम पर महज फर्ज अदायगी होने की आशंका जताई है। उनका कहना है कि सीएमओ मामले में गंभीर होते तो मंगलवार को घटना के बाद ही सख्त कार्रवाई करते, लेकिन हड़ताल के दौरान उनकी मौजूदगी में इलाज न मिलने से तीन मरीज तड़पकर जान गंवा बैठे और सीएमओ सीएमएस कार्यालय में बैठे रहे।
बड़े अधिकारी बढ़ा रहे आरोपियों का हौसला ः स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की संवेदनहीनता ही है कि सिविल अस्पताल में हंगामे और मरीजों को होने वाली समस्या और मौतों के जिम्मेदारों की जांच उनके करीबियों को सौंप दी गई। इस निर्णय से जांच पर पहले से ही सवाल उठने लगे हैं। अस्पताल के अधिकारियों की ढिलाई से हुई इस हड़ताल के जिम्मेदार कर्मचारी बुधवार को भी सही से काम नहीं कर रहे थे। सीएमओ ने अस्पताल पहुंचकर कई कर्मचारियों को निर्देश दिए।
सुरक्षा कर्मी गिनते रहे सीएमओ ः जिनके मरीजों की मौत हुई कई की हालत बिगड़ी और बहुत इलाज नहीं मिलने से दूसरे अस्पतालों में गए। इनको न्याय दिलाने के लिए जांच अधिकारी बनकर पहुंचे सीएमओ डॉ एसएनएस यादव ने इन बिंदुओं की ध्यान रखने की जरूरत ही नहीं समझी। सीएमओ वार्ड के बाहर सुरक्षा गार्डों को गिनती करने लगे। इसके बाद डॉक्टरों को देखा कि वह ओपीडी में बैठे हैं कि नहीं। हड़ताल के दौरान जिन मरीजों को इलाज नहीं मिला, उनमें से कई सिविल अस्पताल में अब भी भर्ती हैं। इनको भरोसा था कि जांच करने आए अधिकारी उनका बयान दर्ज करेंगे। ऐसा नहीं होने पर मरीज व तीमारदार मायूस हो गए।