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देर से सही, जगी विरासत के संरक्षण की उम्मीद

Thu, 18 Apr 2013 05:30 AM IST
Lucknow
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लखनऊ। इस बार विश्व विरासत दिवस पर लखनऊ के विरासतों को सहेजने में हालात सकारात्मक होते दिख रहे हैं। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ने आखिरकार लखनऊ की प्रमुख पहचान रूमी दरवाजे की मरम्मत अगले महीने से शुरू करवाने की सुध ली है। हालांकि राजधानी की अन्य र्कई धरोहरें भी खतरे में हैं, जिनका संरक्षण करने के लिए न सिर्फ एएसआई, बल्कि राज्य पुरातत्व विभाग को भी संवेदनशील रुख अपनाना होगा। विश्व विरासत दिवस पर राजधानी स्थित धरोहरों की बदहाली और इनके संरक्षण के लिए हुई सकारात्मक शुरुआतों को बयां करती ‘अमर उजाला’ की विशेष रिपोर्ट :
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आसफी इमामबाड़े के पास स्थित रूमी दरवाजा 22 दिसंबर 1920 को संरक्षित इमारत घोषित किया गया था। इसे एएसआई के अधीन रखा गया, लेकिन नौ दशक बीतने के बाद भी इसका संरक्षण नहीं हो पाया। इस गेट से होकर लगातार वाहन निकलते रहते हैं। जानकारों के अनुसार, अगर इसका वक्त रहते रेस्टोरेशन नहीं करवाया गया तो निकट भविष्य में यह गिर भी सकता है। फिलहाल इसमें एक दरार आ चुकी है। इन हालात को भांपते हुए एएसआई ने इसकी सुध ली है। विभाग के सुप्रिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट लखनऊ डॉ. प्रवीण कुमार मिश्रा ने बताया कि मई से रूमी दरवाजे का रेस्टोरेशन शुरू किया जाएगा। पहले चरण में इसके ऊपरी हिस्से में हुई टूट-फूट सुधारी जाएगी। दूसरे चरण में इसमें की गई चित्रकारी व डिजाइन का संरक्षण किया जाएगा। अंतिम चरण में इसके टूटे हुए बाकी हिस्सों और प्लास्टर को ठीक किया जाएगा। इस काम में काफी समय लग सकता है क्योंकि इन सभी का पुरातात्विक महत्व है और ये दरवाजे की शोभा बढ़ाते हैं। एएसआई इसका एस्टीमेट बनाने में जुट गया है जिसे केंद्र सरकार को भेजा जाएगा।

दरार गहरी नहीं, दुरुस्त हो जाएगी
डॉ. मिश्रा के अनुसार रूमी दरवाजे में आई दरार गहरी नहीं है। रेस्टोरेशन के दौरान इसे भर दिया जाएगा। वे बतौर विशेषज्ञ दावा करते हैं कि यह दरार इमारत के लिए खतरा नहीं सकेगी।
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काल्पी-कालिंजर : प्रदेश भर में जीर्णोद्धार
एएसआई लखनऊ सर्किल के तहत अवध और बुंदेलखंड के 30 जिले आते हैं। डॉ. मिश्रा के अनुसार विभाग महत्वपूर्ण और रिनोवेशन की जरूरत वाले स्मारकों का लगातार अध्ययन करवा रहा है और जरूरत होने पर रेस्टोरेशन करवाया जा रहा है। इनमें बांदा स्थित कालिंजर का किला प्रमुख है। उन्हाेंने बताया कि यहां बड़े स्तर पर काम किया जाना है। जालोन के काल्पी स्थित गुंबद का संरक्षण कराया जा रहा है। इलाहाबाद के खुसरो बाग और झांसी के किला को भी विभाग अपनी प्राथमिकता वाले कार्यों में ले रहा है।

1920 के बाद से कोई स्मारक संरक्षित नहीं
राजधानी के विभिन्न हिस्सों में मौजूद पुरानी इमारतें बदहाल हो रही हैं, लेकिन एक भी इमारत को 22 दिसंबर 1920 के बाद से संरक्षित की श्रेणी में नहीं डाला गया। इस काम के लिए विभाग को सिर्फ इतना भर करना है कि राजधानी में 100 वर्ष से अधिक पुराने जो स्मारक उसके या राज्य पुरातत्व निदेशालय के अधीन नहीं हैं, उनका अध्ययन करवाके एक अधिसूचना जारी करे कि एएसआई इन्हें संरक्षित करने जा रहा है। पुरातत्व स्मारकों व स्थलों के संरक्षण पर बने अधिनियम 1958 के सेक्शन 4 के तहत विभाग यह कर सकता है। इसके दो महीने बाद वह इमारत को अपने अधीन ले सकता है।

खो गए पांच स्मारक
कहने को तो एएसआई की सूची के अनुसार लखनऊ में 60 स्मारकों को संरक्षित की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन इनमें से पांच के बारे में विभाग को कोई जानकारी नहीं है। इनमें कई महत्वपूर्ण स्मारक शामिल हैं। पुरातत्व संरक्षणविद् मोहम्मद हैदर रिजवी द्वारा आरटीआई के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार राजधानी के इन पांच महत्वपूर्ण स्मारकों के बारे में एएसआई को कोई जानकारी ही नहीं है।
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