लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने महामाया इंफ्राबिल्ड प्रा. लिमिटेड पर दो लाख रुपए का हर्जाना लगाने संबंधी आदेश का रिव्यू करने व संशोधित करने से इन्कार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इसमें जाहिर तौर पर कोई त्रुटि नहीं है। ऐसे में यह मुनासिब नहीं होगा कि आदेश के उस अंश को संशोधित या ‘ रिव्यू’ किया जाए।
वरिष्ठ न्यायमूर्ति उमानाथ सिंह व न्यायमूर्ति डॉ. सतीश चंद्रा की खंडपीठ ने यह फैसला महामाया इंफ्राबिल्ड प्रा. लिमिटेड द्वारा दायर रिव्यू याचिका को खारिज करते हुए सुनाया। इसमें याची ने छह फरवरी 2013 को दो लाख हर्जाने के साथ रिट खारिज किए जाने संबंधी फैसले का पुनरावलोकन किए जाने का आग्रह किया था। अदालत ने कहा, चूंकि पृष्ठभूमि पर गौर करने केबाद छह फरवरी केआदेश में दो लाख हर्जाना लगाया गया था। उधर उ.प्र. आवास विकास परिषद की तरफ से कहा गया कि छह फरवरी के कोर्ट के आदेश के बाद पारित किए गए सभी आदेशों को वापस ले लिया जाएगा और सभी संबंधित पक्षकारों को कारण बताने का मौका देने के बाद अफसर मामले पर नए सिरे से गौर करेंगें। गौरतलब है कि छह फरवरी को कोर्ट ने अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग करने पर महामाया इंफ्राबिल्ड प्रा.लि. पर दो लाख रुपये बतौर हर्जाना ठोंकते हुए आवास विकास परिषद को जमीन का आवंटन रद्द करने की छूट दी थी। यह मामला वृंदावन योजना में प्लॉट के विवाद का था, जिसे कोर्ट ने दीवानी प्रकृति का बताते हुए रिट दायर किए जाने को गलत करार दिया था।